
क्या आपको लगता है कि महीने की 4-5 हजार रुपये की किस्त से कोई फर्क नहीं पड़ता? अगर हां, तो संभल जाइए। आज नया खतरा युवाओं को अपनी चपेट में ले रहा है, जिसे एक्सपर्ट्स ‘साइलेंट डेट’ कह रहे हैं। यह चुपके से जमा होने वाला कर्ज छोटे-छोटे लोन से शुरू होता है और धीरे-धीरे आपकी पूरी कमाई निगल लेता है, जिससे मिडिल क्लास कंगाली की कगार पर पहुंच जाता है। भारत में RBI की रिपोर्ट के मुताबिक, घरेलू कर्ज GDP का 40% से ज्यादा हो चुका है, जिसमें 32% हिस्सा क्रेडिट कार्ड, BNPL और पर्सनल लोन जैसे अनसिक्योर्ड कर्ज का है।
साइलेंट डेट कैसे शुरू होता है?
यह सब एक छोटी सी चाहत से शुरू होता है। नया स्मार्टफोन, दोस्तों के साथ अचानक ट्रिप या इंस्टाग्राम पर दिखी फैंसी गैजेट- BNPL स्कीम्स और जीरो डाउन पेमेंट EMI ने इसे आसान बना दिया है। फाइनेंशियल एक्सपर्ट्स बताते हैं कि साइलेंट डेट वह कर्ज है जो अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर बंटा रहता है, इसलिए कुल बोझ का अंदाजा नहीं लगता। ₹5000 की 10 EMI भी सालाना ₹60,000 ब्याज जोड़ सकती हैं, क्योंकि अनसिक्योर्ड लोन पर 36-48% ब्याज लगता है, जबकि सैलरी महज 7-11% सालाना बढ़ती है।
युवाओं पर सबसे ज्यादा असर क्यों?
Gen Z और मिलेनियल्स इसके सबसे बड़े शिकार हैं। FOMO (Fear of Missing Out) की वजह से सोशल मीडिया पर दूसरों की लग्जरी लाइफ देखकर हैसियत से ज्यादा खर्च होता है। लाइफस्टाइल इन्फ्लेशन भी कमाल करता है- सैलरी बढ़ते ही बजाय बचत के महंगे गैजेट्स या कार पर EMI। सबसे घातक है ‘लोन ऑन लोन’- पुरानी किस्त भरने को नया कर्ज, जो दलदल में धकेल देता है। नवभारत टाइम्स की रिपोर्ट कहती है कि मिडिल क्लास महंगाई या टैक्स से नहीं, EMI से सबसे ज्यादा परेशान है।
खतरे के 5 संकेत
पांच खतरे के संकेत दिखें तो तुरंत सावधान हो जाइए। पहला, सैलरी का 50% से ज्यादा EMI पर जा रहा हो- बैंक 50-55% तक देते हैं, लेकिन 30-40% से ऊपर खतरा है। दूसरा, एक EMI चुकाने को दूसरा लोन लेना पड़ रहा हो। तीसरा, किस्तें बाउंस होने लगें। चौथा, महीने के अंत में पैसे न बचें (Paycheque to Paycheque लिविंग)। पांचवां, इमरजेंसी के लिए कोई फंड न हो। 11% युवा छोटे कर्ज चुकाने में फेल हो रहे हैं।
इस जाल से कैसे बचें?
इस जाल से बचना और बाहर निकलना मुमकिन है। सबसे पहले डायरी उठाएं और सभी लोन की लिस्ट बनाएं- कुल बकाया, ब्याज दरें नोट करें। हाई-इंटरेस्ट वाले (जैसे क्रेडिट कार्ड) को प्राथमिकता से चुकाएं- स्नोबॉल मेथड अपनाएं। कई छोटे लोन हों तो बैलेंस ट्रांसफर कर एक पर्सनल लोन में कन्वर्ट करें, जहां ब्याज 12-18% रहता है। सैलरी का 35% से ज्यादा कभी EMI पर न जाने दें। जरूरत (Needs) और चाहत (Wants) में फर्क सीखें, FOMO से बचें और 3-6 महीने का इमरजेंसी फंड बनाएं। बजट ऐप्स जैसे Money Manager इस्तेमाल करें।
कड़वा सच और आखिरी सलाह
कड़वा सच यही है- ₹5000 EMI 5-10 साल में ₹50 लाख का पहाड़ बन सकती है अगर रोलओवर होता रहा। जागरूक रहें, वरना साइलेंट डेट की चपेट में कंगाली तय है। आज ही अपने फाइनेंस का हिसाब लगाएं!









