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क्या होती है क्राउडफंडिंग? दूसरों से जुटाए गए पैसों पर कितना देना पड़ता है इनकम टैक्स? यहाँ समझें पूरा गणित

सोशल मीडिया और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म ने पैसे जुटाने का तरीका बदल दिया है। इलाज, पढ़ाई या बिजनेस के लिए अब लोग क्राउडफंडिंग का सहारा लेते हैं। भारत में यह लीगल है, लेकिन कई मामलों में इससे मिली राशि पर इनकम टैक्स लग सकता है, खासकर जब यह व्यक्ति के निजी खाते में सीधे आती है।

By Pinki Negi

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सोशल मीडिया और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के युग में हर काम करने का तरीका बदल चुका है। पहले घर में डाकिया चिट्ठियां और शादी के कार्ड लेकर आता था, अब न्योते व्हाट्सऐप या इंस्टाग्राम पर शेयर हो जाते हैं। गुड न्यूज से लेकर बैड न्यूज, सब कुछ अब “स्टेटस” या “स्टोरी” के ज़रिए नाते‑रिश्तेदारों तक पहुंच जाता है। अब तो पैसे जुटाने का काम भी ऑनलाइन चल निकला है, जिसे टेक्निकल भाषा में “क्राउडफंडिंग” कहा जाता है।

क्राउडफंडिंग क्या है?

सीधे शब्दों में, क्राउडफंडिंग का मतलब है- अनजान लोगों की “क्राउड” से अपनी किसी खास ज़रूरत के लिए पैसे जुटाना। यह बहुत पुरानी रिवाजी तरीकों का डिजिटल वर्जन है। गांव‑गली में भंडारे या दान के लिए डब्बे रखे जाते थे, मंदिर‑मस्जिद बनाने के लिए चंदा लिया जाता था। अब यही काम सोशल मीडिया और क्राउडफंडिंग प्लेटफॉर्म के ज़रिए ज़्यादा बड़े स्केल पर होता है। मान लीजिए किसी के पास जानलेवा बीमारी के इलाज के लिए पैसा नहीं है, तो वह या उसके परिवार वाले ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर कैंपेन खोलकर दुनिया भर के अनजान लोगों से मदद मांगते हैं। इस तरह इकट्ठा हुए पैसे ही क्राउडफंडिंग कहलाते हैं।

वैश्विक स्तर पर क्राउडफंडिंग बहुत बड़ा बिज़नेस बन चुकी है। एक अनुमान के मुताबिक, दुनिया भर में हर साल लगभग 1.50 लाख करोड़ रुपये क्राउडफंडिंग के ज़रिए इकट्ठा होते हैं, और यह आंकड़ा 2028 तक 3.50 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने की आशंका है। भारत में भी सैकड़ों वेबसाइट्स और NGO क्राउडफंडिंग में मदद कर रहे हैं।

क्राउडफंडिंग की शुरुआत और तरहें

क्राउडफंडिंग की पहली डेडिकेटेड वेबसाइट 2001 में ब्राएन कैमिलो ने शुरू की थी, जिसका नाम “आर्टिस्टशेयर (ArtistShare)” रखा गया। यह प्लेटफॉर्म कलाकारों के लिए फंड जुटाने पर आधारित था। तब से यह तरीका बदल‑बदल कर तरह‑तरह के फॉर्म धारण कर चुका है।

आज क्राउडफंडिंग सिर्फ चैरिटी या धार्मिक कामों तक सीमित नहीं रही। सबसे ज़्यादा इसका इस्तेमाल इलाज, पढ़ाई और बिजनेस के लिए हो रहा है। लोग मेडिकल इलाज के लिए अकाउंट खोलकर फंड जुटाते हैं, छात्र पढ़ाई के खर्चे के लिए ऑनलाइन कैंपेन चलाते हैं, तो कुछ स्टार्टअप अपनी दुकान या टेक्नोलॉजी प्रोजेक्ट के लिए कैपिटल ढूंढते हैं। कुछ मामलों में लोग शादी, हनीमून या विदेश यात्रा के लिए भी क्राउडफंडिंग का सहारा लेते हैं।

क्राउडफंडिंग की मुख्य तीन‑चार तरहें हैं:

  • चैरिटी बेस्ड: दया और मानवता के आधार पर मदद मांगी जाती है, जैसे इलाज या आपदा पीड़ितों के लिए।
  • रिवॉर्ड बेस्ड: मदद करने वाले को उसी की एवज में कोई प्रोडक्ट या सर्विस दी जाती है।
  • इक्विटी बेस्ड: फंड देने वाले को नए बिजनेस में शेयर मिलता है; यह भारत में अभी गैर‑कानूनी या नियम‑बाधित माना जाता है।
  • लोन बेस्ड: छोटे‑छोटे लोग छोटी रकम देकर बड़ा फंड बनाते हैं, जो बाद में ब्याज समेत लौटा दिया जाता है।

कौन‑से प्लेटफॉर्म हैं?

भारत में कई ऑनलाइन प्लेटफॉर्म क्राउडफंडिंग की मदद करते हैं। मिलाप (Milaap)इम्पैक्टगुरुKetto जैसी साइटें इलाज और चैरिटी के लिए ज़्यादा इस्तेमाल होती हैं। वहीं Kickstarter, Indiegogo, Fundly, Crowdfunder और GoFundMe अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लोगों के बिजनेस या योजनाओं के लिए फंड जुटाने में मदद करती हैं।

क्राउडफंडिंग कैसे काम करती है? आप इन प्लेटफॉर्म पर अपनी प्रोफाइल और कैंपेन बनाते हैं, जिसमें आपकी समस्या, जरूरत और बैंक डिटेल्स जैसी जानकारी दी जाती है। प्लेटफॉर्म वाले डॉक्यूमेंट्स और जानकारी की जांच करते हैं, फिर कैंपेन को प्रमोट करते हैं। जो फंड इकट्ठा होता है, उसका एक हिस्सा प्लेटफॉर्म कमीशन के तौर पर लेता है, बाकी राशि आपके खाते में आती है।

क्राउडफंडिंग और इनकम टैक्स: क्या देना पड़ता है?

पहले यह माना जाता था कि क्राउडफंडिंग से जुटाए पैसे सीधे टैक्स‑फ्री हैं, लेकिन हाल के नियम और टैक्स विभाग के रुख ने इसे उलझा दिया है। भारत में कुछ क्राउडफंडिंग प्लेटफॉर्म रजिस्टर्ड चैरिटेबल ट्रस्ट के तहत काम करते हैं, ऐसे मामलों में डोनेशन टैक्स‑फ्री माना जाता है और डोनर को सेक्शन 80G के तहत टैक्स डिडक्शन भी मिल सकता है।

लेकिन समस्या तब शुरू होती है, जब क्राउडफंडिंग सीधे व्यक्ति के नाम पर होती है। पिछले समय में Income Tax Appellate Tribunal (ITAT) ने स्पष्ट किया कि इलाज या बिजनेस के लिए जुटाए गए पैसे अगर आपके खाते में सीधे आते हैं, तो वे सेक्शन 56(2)(x) के तहत गिफ्ट या “टैक्सेबल इनकम” माने जा सकते हैं। यानी अगर आप इलाज के लिए ऑनलाइन कैंपेन चलाते हैं और अस्पताल/दवाइयों में खर्च करते हैं, तो उस खर्च का प्रूफ दिखाने पर टैक्स नहीं लग सकता। लेकिन अगर आप पूरी रकम का खर्च साबित नहीं कर पाते, तो शेष राशि आपकी इनकम के रूप में टैक्सेबल मानी जाएगी।

Author
Pinki Negi
GyanOK में पिंकी नेगी बतौर न्यूज एडिटर कार्यरत हैं। पत्रकारिता में उन्हें 7 वर्षों से भी ज़्यादा का अनुभव है। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत साल 2018 में NVSHQ से की थी, जहाँ उन्होंने शुरुआत में एजुकेशन डेस्क संभाला। इस दौरान पत्रकारिता के क्षेत्र में नए-नए अनुभव लेने के बाद अमर उजाला में अपनी सेवाएं दी। बाद में, वे नेशनल ब्यूरो से जुड़ गईं और संसद से लेकर राजनीति और डिफेंस जैसे कई महत्वपूर्ण विषयों पर रिपोर्टिंग की। पिंकी नेगी ने साल 2024 में GyanOK जॉइन किया और तब से GyanOK टीम का हिस्सा हैं।

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