
भारतीय रुपया इन दिनों डॉलर के मुकाबले न सिर्फ मजबूत हो रहा है, बल्कि अपनी गिरावट के बाद एक तरह से संदेश भी दे रहा है कि RBI के नियंत्रण और विदेशी मुद्रा नीतियों को बाजार निश्चित तौर पर गंभीरता से ले रहा है। पिछले कुछ दिनों में डॉलर के मुकाबले 95.23 पर टूटकर आने वाला रुपया अब वापस 93 के नीचे तक ऊपर उठ गया है, और यह वापसी रिजर्व बैंक की ओर से उठाए गए “सख्त” कदमों के बिना संभव नहीं दिखती।
रुपये की दमदार वापसी
इंटरबैंक विदेशी मुद्रा बाजार में सोमवार को रुपया शुरुआत में थोड़ा ढीला होकर 93.13 पर खुला, लेकिन धीरे‑धीरे खरीदारी बढ़ने के साथ रुपया 92.85 के लेवल तक पहुंच गया। पिछले सत्र के बंद भाव 93.18 के मुकाबले यह रुपये की 33 पैसे की स्पष्ट मजबूती है, जिसने निवेशकों और बैंकों दोनों के बीच एक नई उम्मीद जगाई है। इससे पहले गुरुवार को भी रुपया 152 पैसे बढ़कर 93.18 पर बंद हुआ था, जो रिकॉर्ड निचले स्तर 95.23 के बाद एक बड़ी छलांग मानी जा रही है।
RBI का ‘सख्त संदेश’ और बैंकों पर लगाई गई लिमिट
रुपये की इस दमदार वापसी के पीछे आरबीआई के विदेशी मुद्रा मार्केट में उठाए गए कदमों को सबसे बड़ी वजह बताया जा रहा है। रिजर्व बैंक ने सट्टेबाजी को काबू में लाने के लिए बैंकों के लिए नेट ओपन फॉरेक्स पोजीशन की लिमिट 100 मिलियन डॉलर तक सीमित कर दी है, और बैंकों को 10 अप्रैल तक अपने ज्यादा डॉलर‑लॉन्ग पोजीशन अनवाइंड करने का संकेत दिया है। इसका सीधा असर यह हुआ कि बैंकों को अपनी डॉलर पोजीशन घटाने के लिए बाजार में डॉलर बेचना पड़ा, जिससे रुपये की सप्लाई मजबूत हुई और विनिमय दर तेजी से सुधरी।
जानकारों का मानना है कि RBI का यह दांव सट्टेबाजों पर सीधा दबाव बना रहा है, और अगर यह नीति जारी रही तो रुपया डॉलर के मुकाबले 92 के आस‑पास तक और मजबूत हो सकता है। यह भी कहा जा रहा है कि RBI का एक्शन वास्तव में काम कर रहा है, क्योंकि सट्टेबाजी आधारित डॉलर डिमांड कम होने से रुपये की गिरावट के रुझान में तोड़ लगा है।
बने हुए दबाव और चुनौतियां
रुपये की वापसी के बावजूद बाजार के लिए खतरे कम नहीं हुए हैं। विदेशी संस्थागत निवेशक (FII) लगातार शेयर बाजार से बिकवाली कर रहे हैं; गुरुवार को ही इक्विटी में 9,931 करोड़ रुपये की निकासी दर्ज हुई। इसके अलावा अमेरिकी डॉलर इंडेक्स 0.14 प्रतिशत बढ़कर 100.17 पर पहुंच गया है, जो वैश्विक स्तर पर डॉलर के मजबूत होने का संकेत देता है।
कच्चे तेल की कीमतों में तेजी भी रुपये के लिए खतरे की घंटी बनी हुई है। ब्रेंट क्रूड लगभग 0.66 फीसदी तेजी के साथ 110 डॉलर प्रति बैरल के आस‑पास पहुंच गया है, जिससे भारत के तेल आयात बिल बढ़ने का खतरा है। इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की ओर से ईरान को दी गई धमकी और हॉर्मुज़ स्ट्रेट के खुले रखने की डेडलाइन ने वैश्विक अनिश्चितता को और बढ़ा दिया है, जिससे जोखिम‑घटाने वाले धन पुनः डॉलर की ओर खिंच रहे हैं।
आगे की राह क्या है?
तकनीकी तौर पर रुपये की तेज वापसी से बाजार में उम्मीदें बढ़ी हैं, लेकिन लंबे समय तक इस मजबूती को बनाए रखने के लिए भारत‑अमेरिका नीतिगत संबंध, कच्चे तेल की कीमतें और वैश्विक जियोइंटल परिस्थितियां अहम रहेंगी। रुपये की मजबूती के बावजूद आज शेयर बाजार लाल निशान के साथ कारोबार कर रहा है, जो दिखाता है कि घरेलू निवेशक अभी भी वैश्विक जोखिम और जियोपॉलिटिकल तनावों को लेकर सतर्क हैं। फिर भी, RBI के इस “मास्टरस्ट्रोक” ने रुपये को न केवल तत्काल राहत दी है, बल्कि यह भी साबित किया है कि भारतीय अर्थव्यवस्था को डॉलर के दबाव में फंसे बिना नियंत्रित तरीके से बचाया जा सकता है।









