
किसानों के लिए एक नया ‘हरा सोना’ उभर रहा है। चंदन और अगरवुड की खेती न सिर्फ कमाई का जैकपॉट है, बल्कि बुढ़ापे में पेंशन जैसी स्थायी आय का स्रोत भी। इनकी लकड़ी सोने के भाव बिकती है, जिसकी वैश्विक मांग इत्र, परफ्यूम और आयुर्वेदिक उत्पादों में आसमान छू रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि छोटे किसान भी 10-15 पेड़ लगाकर लाखों-करोड़ों कमा सकते हैं।
चंदन की सुनहरी खेती
चंदन की खेती लंबी लेकिन सुनहरी। इसकी लकड़ी बाजार में ₹12,000 से ₹15,000 प्रति किलो तक बिकती है। एक पेड़ को परिपक्व होने में 12-15 साल लगते हैं, जिसमें 15-20 किलो तेलयुक्त लकड़ी निकल सकती है। खास बात यह है कि चंदन परजीवी पौधा है, इसलिए नीम या जामुन जैसे होस्ट ट्री के साथ लगाना जरूरी। एक एकड़ में 400 पेड़ लगाने पर 15 साल बाद ₹2-3 करोड़ का मुनाफा संभव।
अगरवुड को ‘देवताओं की लकड़ी’ कहते हैं। 8-12 साल में तैयार, इसकी कीमत ₹50,000 से ₹4 लाख प्रति किलो तक। फंगस संक्रमण से राल बनती है, जो दुनिया के महंगे परफ्यूम में काम आती है। 140 पौधों पर ₹90,000 निवेश से किसान करोड़पति बन चुके हैं।
सरकारी प्रोत्साहन और सुरक्षा
सरकार भी प्रोत्साहित कर रही। हरियाणा की ‘प्राण वायु देवता योजना’ में 75 साल पुराने पेड़ों को ₹2750 सालाना पेंशन मिलती है। वन विभाग से लाइसेंस अनिवार्य, क्योंकि चोरी का खतरा रहता है। किसानों को सीसीटीवी या बाड़ लगाने की सलाह दी जाती। उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में मिट्टी-पानी की जांच के बाद सब्सिडी उपलब्ध। प्रमाणित नर्सरी से पौधे लें, ताकि धोखा न हो।
किसान की सफल कहानी
मेरठ के किसान रामवीर सिंह ने बताया, “10 साल पहले 20 अगरवुड लगाए, आज करोड़ों की संपत्ति। बुढ़ापे की चिंता खत्म।” महोगनी जैसे अन्य पेड़ भी जोड़ें तो आय दोगुनी। लेकिन जलवायु अनुकूल मिट्टी जरूरी- चंदन के लिए रेतीली, अगरवुड के लिए नम। वैज्ञानिकों का आगाह: जल्दबाजी न करें, विशेषज्ञ सलाह लें।
यह खेती कृषि क्रांति ला सकती है। छोटे जोत वाले किसान बंजर जमीन को सोने की खान बना सकते हैं। सरकार की योजनाओं से जोड़ें तो किसान आत्मनिर्भर होंगे। कुल मिलाकर, चांदी नहीं- सोना उगाना किसानों के हाथ में।









