
भारत की श्रम अदालतों में न्याय की धीमी गति ने लाखों मजदूरों को लंबे इंतजार की मार झेलने को मजबूर कर दिया है। उत्तर प्रदेश जैसे औद्योगिक राज्यों में 20 श्रम न्यायालय और 6 औद्योगिक ट्रिब्यूनल होने के बावजूद, मामलों का निपटारा 10-12 वर्ष तक खिंच जाता है, जबकि कानून में मात्र 3 माह का प्रावधान है। मार्च 2026 की स्थिति में निपटारे में देरी संरचनात्मक कमियों, रिक्त पदों और जटिल प्रक्रियाओं से उपजी है।
नए श्रम कानूनों का संक्रमण काल
पहली बड़ी वजह है नए श्रम कानूनों का संक्रमण काल। 1 अप्रैल 2026 से चारों लेबर कोड्स (औद्योगिक संबंध संहिता 2020 सहित) पूरे देश में लागू हो जाएंगे। इससे पुराने कानून जैसे औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 और ट्रेड यूनियन अधिनियम 1926 निरस्त हो रहे हैं। ट्रिब्यूनल का पुनर्गठन होगा, जहां राष्ट्रीय-क्षेत्रीय स्तर पर नई संरचना बनेगी। पुराने ट्रिब्यूनल तब तक चलेंगे, जिससे केस हस्तांतरण में अनिश्चितता और देरी बढ़ रही है।
प्रशासनिक सुस्ती और रिक्त पद
दूसरा, प्रशासनिक सुस्ती। कई अदालतों में पीठासीन अधिकारी (Presiding Officers) के पद खाली हैं, जिससे सुनवाई की तारीखें लंबी हो जाती हैं। फैसला आने के बाद भी प्रवर्तन में वर्षों लग जाते हैं। राजस्थान हाईकोर्ट ने हालिया मामले में अधिकारियों को तलब किया, जहां 7 साल बाद भी फैसला लागू न हुआ। गुजरात अध्ययन बताते हैं कि सबूत पेशी के चरण में सबसे अधिक विलंब होता है।
लंबी कानूनी प्रक्रिया और अपीलें
तीसरा, लंबी कानूनी प्रक्रिया। पक्षकारों (मालिक-यूनियन) द्वारा बार-बार स्थगन मांगना, ऊपरी अदालतों में अपील और दस्तावेज देरी सामान्य है। एक होटल कर्मचारी को 34 वर्ष के संघर्ष के बाद सुप्रीम कोर्ट से न्याय मिला, लेकिन तब तक उसकी मृत्यु हो चुकी थी। तकनीकी पेच जैसे ‘मजदूरी’ की नई परिभाषा और आउटसोर्सिंग पर विवाद भी बढ़ा रहे हैं। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आउटसोर्सिंग को शोषणकारी बताया।
सुधार की राह में बाधाएं
सरकार लोक अदालतें, कैंप कोर्ट और लिंक ऑफिसर सिस्टम चला रही है, लेकिन सुधार नगण्य हैं। नए कोड्स से उम्मीद है, पर रिक्त पद भरना और फैसलों का सख्त क्रियान्वयन जरूरी। मजदूरों का इंसाफ अब भी तारीख पर तारीख बनकर रह गया।









