
CAFE‑3 लागू होने से एंट्री‑लेवल कारों पर बड़ा झटका पड़ सकता है- इंडस्ट्री का दावा है कि सस्ती कारें 17% तक महंगी हो सकती हैं, जबकि सरकार की एजेंसी BEE लागत को इससे काफी कम मान रही है। सरकार का मकसद CAFE‑3 यानी कॉरपोरेट एवरेज फ्यूल एफिशिएंसी के जरिए कार कंपनियों के पूरे बेड़े की औसत फ्यूल एफिशिएंसी बढ़ाना और प्रति किलोमीटर CO₂ उत्सर्जन घटाना है।
2027–2032 के लिए प्रस्तावित मानक मौजूदा CAFE‑II (करीब 113 g CO₂/km) से काफी सख्त हैं और औसत उत्सर्जन को करीब 91.7 g CO₂/km तक लाने का लक्ष्य रखते हैं। इसी तेज कटौती को लेकर इंडस्ट्री और सरकार की एजेंसी BEE के बीच असली टकराव दिख रहा है- लक्ष्य पर्यावरण के लिए ज़रूरी माने जा रहे हैं, लेकिन लागत और व्यवहारिकता पर सवाल उठ रहे हैं।
17% महंगी हो सकती हैं सस्ती कारें?
इंडस्ट्री सूत्रों के मुताबिक, अगर CAFE‑3 मौजूदा ड्राफ्ट के अनुसार लागू हुआ तो एंट्री‑लेवल कारों की कीमत में औसतन 17% तक इजाफा हो सकता है। BEE का आधिकारिक अनुमान है कि तकनीकी अपग्रेड के लिए प्रति वाहन लगभग 15,000 रुपये अतिरिक्त लगेंगे, जबकि कंपनियों का कहना है कि सिर्फ रियल कॉस्ट ही 25,000 रुपये (करीब 7%) तक पहुंच सकती है।
अगर फ्लेक्स‑फ्यूल या कार्बन‑न्यूट्रल विकल्प अपनाए जाते हैं, तो इंडस्ट्री के मुताबिक यह अतिरिक्त लागत 65,000 रुपये तक जा सकती है, जो कई एंट्री‑लेवल मॉडल के लिए 17% के आसपास कीमत बढ़ोतरी के बराबर है। इंडस्ट्री का तर्क है कि BEE ने अपने कैलकुलेशन में केवल हार्डवेयर/पार्ट्स की सीधी कीमत को ध्यान में रखा है, जबकि कंपनी‑स्तर पर इंजीनियरिंग बदलाव, सप्लायर अपग्रेड, टेस्टिंग और वैलिडेशन जैसे खर्च इस अनुमान में ठीक से शामिल नहीं हैं।
क्या इतने खर्च के बाद भी लक्ष्य पूरे नहीं होंगे?
सबसे चिंताजनक बात यह मानी जा रही है कि भारी निवेश के बाद भी कई छोटी कारें तय उत्सर्जन लक्ष्य से काफी ऊपर रह सकती हैं।
इंडस्ट्री के आंतरिक आंकड़ों के अनुसार, लगभग 740 किलो वजन वाली एक एंट्री‑लेवल कार का उत्सर्जन अपग्रेड के बाद भी करीब 83.43 g CO₂/km रह सकता है, जबकि FY32 के लिए लक्ष्य 62.04 g CO₂/km है – यानी लगभग 21.39 g CO₂/km की कमी फिर भी बाकी रहेगी।
फ्लेक्स‑फ्यूल जैसे विकल्प अपनाने पर भी यह गैप लगभग 7.49 g CO₂/km तक बना रह सकता है, यानी पूरी तरह लक्ष्य तक पहुंचना मुश्किल दिखता है। कंपनियों का कहना है कि ऐसे हालात में उन्हें दोहरी मार झेलनी होगी – पहले महंगा अपग्रेड और फिर भी नॉर्म्स न पूरे होने पर पेनल्टी।
दोहरी मार: टेक्नोलॉजी खर्च + पेनल्टी
ऑटो कंपनियों को एक तरफ नई फ्यूल‑सेविंग या लो‑कार्बन टेक्नोलॉजी (जैसे फ्लेक्स‑फ्यूल, हाइब्रिड सिस्टम, और बेहतर इंजन/ट्रांसमिशन सेट‑अप) पर भारी निवेश करना पड़ेगा। दूसरी तरफ, अगर उनके पूरे पोर्टफोलियो का औसत CO₂ तय मानक से ऊपर जाता है, तो उन पर पेनल्टी लग सकती है, जो अंतिम तौर पर कार की कीमत में जोड़ी जाएगी। इंडस्ट्री का कहना है कि इस “डबल हिट” से कुल लागत और बढ़ जाएगी और उसका सीधा असर आम ग्राहक की जेब पर दिखेगा, खासकर लो‑मार्जिन एंट्री‑लेवल सेगमेंट में।
सबसे बड़ा खतरा: छोटी कारों का बाजार
CAFE‑3 का ड्राफ्ट स्ट्रक्चर वजन‑आधारित है और हाल के बदलावों में छोटी कारों के लिए प्रस्तावित राहत/छूट वापस ले ली गई है।
विशेषज्ञों का कहना है कि इससे हल्की और सस्ती कारों पर अनुपातिक रूप से ज्यादा दबाव पड़ेगा, जबकि बड़ी SUV और प्रीमियम कारें तुलनात्मक रूप से कम प्रभावित होंगी, क्योंकि उनकी बेस कीमत ऊंची है और उनमें कई टेक्निकल फीचर्स पहले से मौजूद हैं।
डेटा बताता है कि FY19 से FY25 के बीच छोटी कारों की बिक्री में लगभग 62% की गिरावट आ चुकी है; CAFE‑3 के बाद अतिरिक्त कीमत बढ़ोतरी इस गिरावट की रफ्तार और तेज कर सकती है। इंडस्ट्री को डर है कि कंपनियां धीरे‑धीरे एंट्री‑लेवल कारों की बजाय ज्यादा मुनाफे वाली SUV और प्रीमियम मॉडल पर फोकस बढ़ा सकती हैं- एक ट्रेंड जो भारत के बाजार में पहले से दिख रहा है।
इसी के साथ एक और चिंता यह है कि CAFE‑3 से बढ़ने वाली लागत छोटी कारों पर दी गई GST छूट का फायदा लगभग खत्म कर सकती है, यानी टैक्स के जरिए जो राहत सरकार ने दी थी, वह कंप्लायंस कॉस्ट में समाकर आम ग्राहक तक पहुंच ही नहीं पाएगी।
पहली बार कार खरीदने वालों पर असर
एंट्री‑लेवल कारें भारत में दो‑पहिया वाहन से चार‑पहिया पर जाने वाले लाखों परिवारों के लिए पहला कदम होती हैं। अगर इन कारों की कीमतें 50,000 से 80,000 रुपये या 15-17% तक बढ़ती हैं, तो बड़ी संख्या में संभावित खरीदार बाजार से बाहर हो सकते हैं, जिससे ऑटो मार्केट की वॉल्यूम‑ग्रोथ धीमी पड़ने की आशंका है। वहीं, प्रीमियम और SUV सेगमेंट की बिक्री तेज गति से बढ़ती रहने की संभावना है, जो पहले ही इंडस्ट्री के पोर्टफोलियो को “महंगी कारों” की तरफ झुका रही है।









