
शेयर बाजार हो या सर्राफा बाजार, अब हर तरफ एक ही शब्द चल रहा है- “सोना–चांदी क्रैश”। जो धातुएं हाल के समय में आसमान छू रही थीं, आज वे अचानक जमीन पर तो नहीं, लेकिन अपने ही ऊंचे रेकॉर्ड्स से काफी नीचे तक आ गई हैं। इस दौरान निवेशकों की निकल पड़ी है, खासकर उनकी, जिन्होंने उच्चतम स्तर पर धातु खरीदी थीं।
आंकड़ों पर नजर
अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमत लगभग 6.5–7% टूटकर 4,550–4,600 डॉलर प्रति औंस के आसपास आ गई है, जबकि चांदी लगभग 10–13% टूटकर 67–70 डॉलर प्रति औंस के स्तर पर ट्रेड कर रही है। भारत में एमसीएक्स पर दृश्य और ज्यादा ड्रामेटिक है: सोने की कीमतें 10,000–11,000 रुपये प्रति 10 ग्राम तक गिर चुकी हैं, जबकि चांदी में 30,000–34,000 रुपये की एकदम धमाकेदार गिरावट दर्ज हुई है, जिससे भाव करीब 2.18 लाख रुपये प्रति किलो के आसपास फिसल गए हैं।
क्यों टूट रही है पीली धातु की चमक?
सोने–चांदी पर दबाव मुख्य रूप से तीन कारकों का मेल है- ब्याज दरें, महंगाई व तेज फ्यूचर्स–ट्रेडिंग। अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने ब्याज दरें 3.50–3.75% के स्तर पर अभी भी स्थिर रखी हैं और उसने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि रेट कट को लेकर जल्दबाजी नहीं है। ऊंची ब्याज दरें निवेशकों को बॉन्ड, डिपॉजिट या डॉलर‑डेनोमिनेटेड असेट्स की ओर खींचती हैं, क्योंकि वहां ब्याज या कूपन जैसा निश्चित रिटर्न मिलता है, जबकि सोने में कोई ब्याज नहीं।
महंगाई और कच्चे तेल की कीमतें भी इस तस्वीर में अहम भूमिका निभा रही हैं। फेडरल रिजर्व का मानना है कि जब तक महंगाई पूरी तरह काबू में नहीं आती, तब तक रेट कट जोखिम भरा होगा। इस उम्मीद के टूटने के बाद निवेशकों ने मुनाफावसूली तेज कर दी, जिससे अंतरराष्ट्रीय और घरेलू दोनों बाजारों में बड़ी सेलिंग दर्ज हुई।
भारत और वैश्विक माहौल पर असर
कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें भारत जैसे आयातक देश के लिए चिंता का विषय हैं। ज्यादा महंगा तेल चालू खाता घाटे (CAD) को बढ़ा सकता है, जिससे रुपये पर दबाव बढ़ता है और देश में महंगाई की आग और भड़क सकती है। वैश्विक स्तर पर भी तेल आयात करने वाले देशों के शेयर बाजार पर दबाव दिख रहा है, क्योंकि ऊंची लागत से कंपनियों के ऑपरेटिंग मार्जिन पर असर पड़ता है।
इस बीच, सोना दो ताकतों के बीच फंसा हुआ लग रहा है– एक तरफ भू‑राजनीतिक अनिश्चितता और युद्ध‑जैसे जोखिम सुरक्षित निवेश के रूप में इसे बनाए रखते हैं, तो दूसरी तरफ ऊंची ब्याज दरें और मजबूत डॉलर इसकी अपील घटा रहे हैं। अभी तो ब्याज दरों का पलड़ा भारी नजर आ रहा है।
आम निवेशक और खरीदार के लिए रणनीति
उन निवेशकों के लिए यह क्रैश नुकसान जैसा लग रहा है, जिन्होंने रिकॉर्ड या उसके पास–पास के भावों पर सोना–चांदी खरीदी थी, लेकिन नए खरीददारों और लंबी अवधि के निवेशकों के लिए यह एक अच्छा डिप बन सकता है। एक्सपर्ट्स की सलाह है कि एक ही बार में बड़ा लॉट न खरीदें; बल्कि SIP‑स्टाइल या लागत‑औसत (DCA) तकनीक के जरिए छोटे–छोटे हिस्सों में खरीद करें।
आम उपभोक्ता जो शादी- गहना या ज्वेलरी खरीद रहा है, वह घरेलू रेट को देखकर ज्वेलर्स के प्रीमियम और GST को जोड़कर फाइनल बजट तैयार करे, ताकि अचानक आने वाले उतार‑चढ़ाव से बचा रह सके। चांदी दोनों तरह की धातुओं में सबसे ज्यादा वोलेटाइल है, इसलिए इसे पोर्टफोलियो में सीमित भूमिका देना उचित रहेगा।
आगे क्या?
कमोडिटी एक्सपर्ट्स का मानना है कि जब तक वैश्विक ब्याज दरें और डॉलर कीरखी नहीं बदलतीं, तब तक सोना और चांदी की चाल अस्थिर रहेगी। भारत में रिजर्व बैंक की रेट‑पॉलिसी और तेल की बढ़ती कीमतों के बीच भी सोने–चांदी पर दबाव या सहारा दोनों ही एक साथ दिख सकते हैं। आने वाले समय में यह जानना जरूरी होगा कि क्या यह गिरावट अस्थायी है या दीर्घकालिक ट्रेंड का हिस्सा, लेकिन अभी के लिए बाजार में निवेशकों की निकल पड़ी है और खरीदारों के लिए एक रियलिस्टिक मौका बन चुका है।









