
आवश्यकता ही आविष्कार की जननी है – यह कहावत एक बार फिर सिद्ध हुई है। ईरान द्वारा स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा शिपिंग रूट – को बंद करने के बाद वैश्विक LPG आपूर्ति में आई कमी ने भारत को झकझोर दिया। लेकिन भारतीय वैज्ञानिकों ने हार नहीं मानी। CSIR-नेशनल केमिकल लेबोरेटरी (CSIR-NCL), पुणे के वैज्ञानिकों ने डाइमिथाइल ईथर (DME) नामक स्वदेशी ईंधन विकसित कर LPG का सस्ता, स्वच्छ और आत्मनिर्भर विकल्प तैयार किया है। इससे न केवल लाखों करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा बचेगी, बल्कि उज्ज्वला योजना के 10.5 करोड़ परिवारों को सस्ता कुकिंग गैस भी मिलेगा।
ईरान संकट: LPG आयात पर खतरा
यह खोज पश्चिम एशिया संकट की पृष्ठभूमि में आई है, जहां भारत 2024 में 21 मिलियन टन LPG आयात पर निर्भर था। ईरान का कदम उठने से सप्लाई चेन बाधित हो गई, जिससे घरेलू गैस की कीमतें आसमान छूने लगीं। CSIR-NCL ने स्वदेशी उत्प्रेरक (कैटेलिस्ट) से मेथनॉल को DME में बदलने की पेटेंट प्राप्त तकनीक विकसित की है।
यह प्रक्रिया मात्र 10 बार दबाव पर काम करती है, जिससे DME को मौजूदा LPG सिलेंडरों में सीधे भरा जा सकता है – कोई बदलाव की जरूरत नहीं। भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) ने IS 18698:2024 मानक जारी कर घरेलू, वाणिज्यिक और औद्योगिक उपयोग के लिए LPG में 20% तक DME मिश्रण को मंजूरी दे दी है।
DME: सस्ता, स्वच्छ और बहुउपयोगी ईंधन
DME एक गैर-विषैले सिंथेटिक गैस ईंधन है, जो जैविक कचरे या कोयले से बनाया जा सकता है। यह LPG से बेहतर जलता है – कालिक (सूट), नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOx), सल्फर ऑक्साइड (SOx) और कणीय पदार्थ (PM) का उत्सर्जन न्यूनतम होता है। तापीय दक्षता LPG जितनी ही है, लेकिन प्रदूषण 50% कम।
विशेषज्ञों के अनुसार, LPG के मात्र 8% हिस्से को DME से बदलने पर सालाना ₹9,500 करोड़ की विदेशी मुद्रा बचत होगी। उज्ज्वला लाभार्थियों के लिए प्रतिदिन 1,300 टन DME उत्पादन पर्याप्त होगा। इसके अलावा, DME ऑटोमोटिव ईंधन (IS 16704:2018 मानक), एयरोसोल प्रोपेलेंट (CFC का विकल्प) और रासायनिक मध्यवर्ती (ओलेफिन, डाइमिथाइल सल्फेट) के रूप में भी इस्तेमाल हो सकता है।
लैब से प्लांट तक का तेज सफर
CSIR-NCL ने पहले ही 250 किग्रा प्रतिदिन वाले पायलट प्लांट पर तकनीक सिद्ध कर ली है। अब प्रोसेस इंजीनियरिंग पार्टनर के साथ 6-9 महीनों में 2.5 टन प्रतिदिन वाले डेमो प्लांट की तैयारी है। सफल होने पर 500-1,000 टन क्षमता वाले व्यावसायिक प्लांट संभव होंगे। संस्थान के डायरेक्टर डॉ. आशीष लेले ने मीडिया कॉन्फ्रेंस में कहा, “हम बड़े तेल PSU और बायोएनर्जी कंपनियों के साथ पार्टनरशिप के लिए तैयार हैं। यह तकनीक ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करेगी।” बेंगलुरु के LPG उपकरण अनुसंधान केंद्र में 100% LPG से 100% DME तक के ब्लेंड पर प्रोटोटाइप बर्नर का परीक्षण सफल रहा है।
भविष्य के बदलाव व चुनौतियां
यह खोज ‘आत्मनिर्भर भारत’ को साकार करेगी। आयात निर्भरता घटने से गैस सिलेंडर सस्ते होंगे, माइलेज बढ़ेगा और पर्यावरण सुरक्षित रहेगा। हालांकि, बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए निवेश और पार्टनरशिप जरूरी है। यदि समय पर प्लांट लगे, तो 2026 अंत या 2027 तक बाजार में DME उपलब्ध हो सकता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि DME न केवल LPG क्राइसिस से निपटेगा, बल्कि भारत को ग्रीन एनर्जी लीडर बनाएगा।









