
भारत में मासिक धर्म छुट्टी (मेन्स्ट्रुअल लीव) को लेकर उठी कानूनी बहस को सुप्रीम कोर्ट ने विराम लगा दिया। 12 मार्च को मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्य कांत की अगुवाई वाली बेंच ने देशभर में इसे अनिवार्य बनाने की मांग वाली जनहित याचिका (पीआईएल) को खारिज कर दिया। सीजेआई ने कड़ी चेतावनी देते हुए कहा कि अगर इसे कानून बना दिया गया तो नियोक्ता महिलाओं को नौकरी देने से कतराने लगेंगे, जिससे उनका करियर खतरे में पड़ सकता है।
कोर्ट की सुनवाई और प्रमुख टिप्पणियां
सुनवाई के दौरान सीजेआई सूर्य कांत और जस्टिस जॉय मालिया बागची की बेंच ने याचिकाकर्ता के वकील से सवालों की बौछार कर दी। याचिकाकर्ता वकील शैलेंद्र मणि त्रिपाठी ने मांग की थी कि कामकाजी महिलाओं और छात्राओं को मासिक धर्म के दौरान हर महीने दो दिन की पेड छुट्टी मिले। वरिष्ठ वकील एम.आर. शमशाद ने तर्क दिया कि गर्भावस्था जैसी छुट्टियां उपलब्ध हैं, तो पीरियड्स के दर्द को क्यों नजरअंदाज किया जाए।
लेकिन कोर्ट ने साफ लहजे में कहा, “स्वैच्छिक छुट्टी देना तो ठीक है, लेकिन कानूनी बाध्यता बनाने से महिलाओं का करियर खत्म हो जाएगा। कोई नियोक्ता हर महीने अतिरिक्त छुट्टी का बोझ क्यों ले?” सीजेआई ने यह भी जोड़ा कि नियोक्ताओं की मानसिकता बदलना जरूरी है, लेकिन अनिवार्य कानून लैंगिक रूढ़ियों को बढ़ावा दे सकता है। कोर्ट ने केंद्र सरकार को नीति बनाने का सुझाव दिया, लेकिन कोई निर्देश नहीं दिया।
वैश्विक परिप्रेक्ष्य: कहां सफल, कहां चुनौतियां?
दुनिया के कई देशों में मेन्स्ट्रुअल लीव पॉलिसी लागू है। जापान (1947 से), दक्षिण कोरिया, स्पेन (2023 में पहला यूरोपीय देश), इंडोनेशिया और ताइवान महिलाओं को साल में कुछ दिनों की छुट्टी देते हैं। स्पेन में इसे 2023 के लेबर कानून में जोड़ा गया, जहां महिलाएं डॉक्टर के सर्टिफिकेट पर पेड लीव ले सकती हैं। इन देशों में इसे स्वास्थ्य अधिकार माना जाता है, लेकिन भारत जैसे विकासशील देशों में लागू करने की आशंकाएं अलग हैं।
भारत में कुछ राज्य और कंपनियां स्वैच्छिक नीतियां चला रही हैं। केरला के शैक्षणिक संस्थानों में छात्राओं को पीरियड्स के दौरान छुट्टी मिलती है। जोमैटो, स्विगी और बायजूस जैसी कंपनियां 10-12 दिन सालाना छुट्टी देती हैं। ये कदम जागरूकता बढ़ा रहे हैं, लेकिन कोर्ट का मानना है कि इन्हें कानूनी रूप से थोपना उल्टा नुकसान करेगा।
क्या बढ़ेगा कार्यस्थल भेदभाव?
विशेषज्ञों का मत है कि अनिवार्य कानून भर्ती प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है। छोटी कंपनियां, जहां संसाधन सीमित हैं, महिलाओं को हायर करने से हिचकिचा सकती हैं। एक अध्ययन के अनुसार, भारत में पहले से ही महिलाओं की श्रम भागीदारी 25% से कम है। अतिरिक्त छुट्टियां लागत बढ़ाएंगी, जिससे लैंगिक असमानता गहरा सकती है। कोर्ट ने इसे नीतिगत मुद्दा बताते हुए सरकार पर छोड़ दिया।
पिछले फैसले और भविष्य की बहस
जनवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने मासिक धर्म स्वास्थ्य को अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार माना। स्कूलों में मुफ्त सैनिटरी नैपकिन, बेहतर टॉयलेट और जागरूकता पर जोर दिया गया। 2024 में भी कोर्ट ने केंद्र को नीति पर विचार करने को कहा था। लेकिन अवकाश को अनिवार्य बनाने से इनकार कर दिया।
यह फैसला बहस को नई दिशा देगा। एक तरफ महिलाओं के स्वास्थ्य की मांग, दूसरी तरफ रोजगार सुरक्षा। विशेषज्ञ सुझाते हैं कि स्वैच्छिक नीतियों को प्रोत्साहन दें, न कि कानूनी बंधन। क्या सरकार अब कदम उठाएगी? समय बताएगा।









