
भारत दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते स्टार्टअप हब के रूप में उभर रहा है। 2025 में स्टार्टअप फंडिंग 20 बिलियन डॉलर को पार कर गई, डिजिटल इकोनॉमी ने लाखों नौकरियां पैदा कीं, और स्टार्टअप इंडिया जैसी सरकारी योजनाओं ने नए बिजनेस को रफ्तार दी। ऐसे में MBA कॉलेजों पर सवाल उठ रहे हैं – क्या ये संस्थान छात्रों को सिर्फ कॉर्पोरेट जॉब्स के लिए तैयार कर रहे हैं, या अपना स्टार्टअप शुरू करने की स्किल्स भी सिखा रहे हैं? हालिया चर्चाओं से साफ है कि बदलाव आ रहा है, लेकिन चुनौतियां बरकरार हैं।
चर्चा में क्या उभरा?
ETEducation की एक महत्वपूर्ण पैनल डिस्कशन में Mudit Dalmia और Vaishnavi Desai ने इस मुद्दे पर गहन विश्लेषण किया। मुदित डालमिया, एक प्रमुख उद्यमी, ने जोर देकर कहा कि MBA संस्थानों का लक्ष्य अब सिर्फ प्लेसमेंट नहीं होना चाहिए। “कॉलेजों को यह देखना होगा कि वे किस तरह के एंटरप्रेन्योर्स तैयार कर रहे हैं,” उन्होंने कहा। पैनल में सामने आया कि पारंपरिक सिलेबस नौकरी-केंद्रित है, लेकिन स्टार्टअप कल्चर के लिए अलग अप्रोच जरूरी है।
दिलचस्प बात यह है कि भारत के टॉप B-स्कूल जैसे IIM अहमदाबाद, ISB हैदराबाद और MDI गुरुग्राम पहले से ही डेफर्ड प्लेसमेंट पॉलिसी चला रहे हैं। इनके तहत छात्र 1-2 साल प्लेसमेंट टाल सकते हैं, अपना बिजनेस शुरू कर सकते हैं, और असफल होने पर दोबारा मौका पा सकते हैं। उदाहरणस्वरूप, IIM कलकत्ता का एंटरप्रेन्योर्शिप सेल हर साल 50 से ज्यादा स्टार्टअप्स को मेंटर करता है। हालांकि, यह सभी कॉलेजों में लागू नहीं – कई छोटे संस्थान अभी भी जॉब गारंटी पर फोकस करते हैं।
किताबों से आगे, रियल वर्ल्ड लर्निंग
डालमिया ने साफ कहा कि किताबी ज्ञान काफी नहीं। छात्रों को रियल-वर्ल्ड प्रॉब्लम्स सॉल्व करने का मौका मिलना चाहिए। “जब छात्र खुद प्रोजेक्ट्स बनाते हैं, तो समस्याएं आसान लगने लगती हैं और कॉन्फिडेंस बढ़ता है,” उन्होंने जोर दिया। कई कॉलेज अब इंक्यूबेटर सेटअप कर रहे हैं, जहां स्टूडेंट्स प्रोटोटाइप बनाते हैं। SP JAIN इंस्टीट्यूट जैसे स्कूल ग्लोबल स्टार्टअप चैलेंज चलाते हैं, जो छात्रों को VC फंडिंग से जोड़ते हैं।
सरकारी स्तर पर 2026 स्टार्टअप अमेंडमेंट ने डीप टेक स्टार्टअप्स को मान्यता दी, टर्नओवर लिमिट 20 साल तक बढ़ाई, और टैक्स हॉलिडे बढ़ाया। DPIIT रजिस्ट्रेशन वाले MBA ग्रेजुएट्स को 3 साल की इनकम टैक्स छूट मिलती है। यूनियन बजट 2026 ने MSME इंसेंटिव्स बढ़ाए, जो नए उद्यमियों के लिए वरदान हैं।
सबसे बड़ी रुकावट: डर का सामना
पैनल की मुख्य बहस डर पर केंद्रित रही – असफलता का डर, सोसाइटी का जजमेंट, और अलग रास्ता चुनने का हिचकिचाहट। “सबसे पहले मेंटालिटी चेंज करो। फेलियर को लर्निंग मानो,” डालमिया ने सलाह दी। कॉलेजों में अक्सर ‘वन-साइज-फिट्स-ऑल’ अप्रोच होता है, जो क्रिएटिविटी को दबाता है। जरूरी है अलग सोच को बढ़ावा दें – हर स्टूडेंट की जिज्ञासा को निखारें।
इसीलिए मेंटर्स, पीयर ग्रुप्स और रिस्क-फ्री एनवायरनमेंट जरूरी हैं। कॉलेजों को इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स, इन्वेस्टर्स और इंक्यूबेटर्स से लिंकअप बढ़ाना होगा। हर स्टूडेंट उद्यमी नहीं बनेगा, लेकिन जो चाहें, उन्हें सपोर्ट मिलना चाहिए।
भविष्य की दिशा
भारत का स्टार्टअप इकोसिस्टम 2026 में 1 लाख स्टार्टअप्स को पार कर चुका है। MBA संस्थानों को सिस्टम में बदलाव लाना होगा – प्रैक्टिकल कोर्सेस, फंडिंग टाई-अप्स और फेल-सेफ पॉलिसीज। अगर ऐसा हुआ, तो ‘MBA से IPO’ का सफर आम हो जाएगा।
Solar Dukan जैसे दिल्लीवासियों के लिए FMS दिल्ली या IIM रोहतक जैसे संस्थान बेहतर विकल्प हैं, जहां फाइनेंस और सरकारी स्कीम्स पर फोकस है। स्टार्टअप इंडिया पोर्टल चेक करें- आपका बिजनेस आइडिया यहीं से उड़ान भर सकता है। कुल मिलाकर, MBA अब जॉब का टिकट नहीं, बल्कि उद्यमिता का प्लेटफॉर्म बन रहा है।









