
दुनिया भर में करीब 3.4 अरब लोग आज भी मोबाइल इंटरनेट की पहुंच से बाहर हैं, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था को लगभग 3 खरब डॉलर का नुकसान हो रहा है। हालाँकि मोबाइल नेटवर्क अब दुनिया के कोने-कोने में पहुँच चुका है, लेकिन कनेक्टिविटी होने और उसका असल में इस्तेमाल करने के बीच की खाई लगातार बढ़ रही है। जहाँ कतर जैसे देशों ने सरकारी सहयोग से शानदार 5G नेटवर्क और 80% तक इंटरनेट पहुँच बना ली है, वहीं जॉर्डन, मिस्र और मोरक्को जैसे कम आय वाले देशों में 2030 तक भी यह आंकड़ा मात्र 20-30% तक ही पहुँचने का अनुमान है।
इंटरनेट होने के बावजूद 310 करोड़ लोग ऑफलाइन
दुनिया में इंटरनेट न इस्तेमाल करने वाले 340 करोड़ लोगों में से 310 करोड़ लोग ऐसे हैं, जो नेटवर्क क्षेत्र में रहने के बावजूद ऑनलाइन नहीं हैं। इस ‘यूसेज गैप’ (Usage Gap) का सबसे बड़ा कारण महंगे स्मार्टफोन और डेटा की कीमतें हैं। इसके अलावा डिजिटल कौशल की कमी और स्थानीय भाषा में कंटेंट न होना भी बड़ी बाधाएं हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस खाई को पाट दिया जाए, तो डिजिटल पेमेंट और शिक्षा के विस्तार से वैश्विक अर्थव्यवस्था में खरबों डॉलर जुड़ सकते हैं, जिसका सबसे अधिक लाभ महिलाओं और छोटे व्यवसायों को मिलेगा।
ऑनलाइन होने से कैसे बढ़ती है कमाई?
इंटरनेट कनेक्टिविटी किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए ‘ग्रोथ बूस्टर’ की तरह काम करती है। जब लोग और व्यवसाय ऑनलाइन जुड़ते हैं, तो उन्हें बड़े बाजार, सस्ते संसाधन और काम करने के बेहतर तरीके मिलते हैं। धीरे-धीरे ये छोटे-छोटे फायदे जुड़कर एक बड़ा आर्थिक बदलाव लाते हैं, जिससे देश की कुल जीडीपी (GDP) में भारी बढ़त दर्ज की जाती है।
वीडियो प्लेटफॉर्म और टेलीकॉम कंपनियों के बीच छिड़ी जंग
इंटरनेट नेटवर्क के विस्तार के लिए भारी निवेश की जरूरत है, जिससे अब नेट न्यूट्रैलिटी पर नई बहस शुरू हो गई है। टेलीकॉम कंपनियों का तर्क है कि भारी ट्रैफिक पैदा करने वाले वीडियो और स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स को भी नेटवर्क का खर्च उठाना चाहिए। विशेषज्ञों का कहना है कि जहाँ आम लोगों के लिए एक अच्छा 4G नेटवर्क ही काफी है, वहीं 5G और 6G जैसी तकनीकें भविष्य में भारी मशीनों (IoT) और उद्योगों के बीच बातचीत को आसान बनाएंगी, जिससे इंटरनेट ट्रैफिक और भी तेजी से बढ़ेगा।
AI का बढ़ता दौर और इंटरनेट की चुनौती
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के आने से इंटरनेट नेटवर्क की मांग और भी तेजी से बढ़ने वाली है, जिससे बुनियादी ढांचे (Infrastructure) के खर्च को लेकर नए सवाल खड़े हो गए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि दुनिया के बाकी लोगों को इंटरनेट से जोड़ना अब केवल तकनीक का नहीं, बल्कि आर्थिक मामला बन चुका है। जब तक ‘यूसेज गैप’ यानी इंटरनेट इस्तेमाल न कर पाने की समस्या हल नहीं होती, तब तक वैश्विक विकास की एक बड़ी संभावना अधूरी ही रहेगी।









