
अधिकतर कपल्स घर के खर्चों को आसान बनाने और पैसों के लेन-देन में पारदर्शिता रखने के लिए जॉइंट अकाउंट खोलते हैं। इससे “किसने बिल भरा” जैसी छोटी-मोटी बहस खत्म हो जाती है और आर्थिक तालमेल बेहतर होता है। लेकिन, समस्या तब आती है जब पार्टनर्स बिना किसी स्पष्ट नियम के यह मान लेते हैं कि उनकी सोच एक जैसी है। पैसों को लेकर होने वाले मनमुटाव से बचने के लिए यह जरूरी है कि आप केवल खाता ही साझा न करें, बल्कि खर्च करने की सीमा और बचत के नियमों पर भी खुलकर बात करें।
‘Either or Survivor’ बनाम ‘Jointly’
जॉइंट बैंक अकाउंट खोलते समय ‘ऑपरेशन मोड’ का चुनाव करना सबसे महत्वपूर्ण कदम है, क्योंकि यही तय करता है कि खाते पर किसका और कितना नियंत्रण होगा। यहाँ इन दोनों के बीच के मुख्य अंतर को आसान भाषा में समझाया गया है:
- Either or Survivor (किसी एक का अधिकार): इस विकल्प में खाते से जुड़े दोनों व्यक्तियों में से कोई भी एक व्यक्ति अकेले पैसे निकाल सकता है या लेन-देन कर सकता है। यह इमरजेंसी की स्थिति में बहुत मददगार होता है, लेकिन इसमें जोखिम यह है कि आपका पार्टनर आपकी जानकारी के बिना भी बड़ी रकम निकाल सकता है।
- Jointly (दोनों की सहमति): इस मोड में कोई भी ट्रांजैक्शन तब तक पूरा नहीं होता जब तक दोनों पार्टनर की मंजूरी या हस्ताक्षर न हों। यह पैसों पर अधिक नियंत्रण और सुरक्षा देता है, लेकिन छोटे-छोटे कामों के लिए भी दोनों की मौजूदगी अनिवार्य होने के कारण प्रक्रिया थोड़ी धीमी हो सकती है।
जॉइंट अकाउंट और कानूनी मालिकाना हक
अक्सर लोग समझते हैं कि जॉइंट अकाउंट में नाम होने का मतलब है कि आधे पैसे उनके हैं, लेकिन बैंक की नजर में दोनों का नाम होना केवल ‘एक्सेस’ (लेन-देन का अधिकार) है। असली सवाल यह उठता है कि खाते में जमा पैसा किसका है? कानूनी तौर पर, अगर खाते में सारा पैसा केवल एक ही पार्टनर की सैलरी या कमाई से आ रहा है, तो उस पैसे पर उसी का योगदान और मालिकाना हक महत्वपूर्ण माना जाता है। टैक्स और कानूनी विवादों की स्थिति में यह देखा जाता है कि पैसा किस स्रोत (Source) से आया है, न कि सिर्फ यह कि खाते पर किसका नाम लिखा है।
रिकॉर्ड रखना क्यों है समझदारी?
सामान्य दिनों में जॉइंट अकाउंट का इस्तेमाल करना आसान लगता है, लेकिन असली चुनौतियां अलगाव (Separation), पारिवारिक विवाद या विरासत (Inheritance) के समय सामने आती हैं। उस वक्त यह साबित करना मुश्किल हो जाता है कि खाते में जमा रकम में किसका कितना हिस्सा है। यदि खाते में कोई बड़ी राशि जमा की जा रही है, तो उसके योगदान (Contribution) का रिकॉर्ड रखना बहुत जरूरी है। यह स्पष्टता न केवल भविष्य के कानूनी झंझटों से बचाती है, बल्कि संपत्ति के सही बँटवारे में भी मददगार साबित होती है।
पार्टनर की मृत्यु के बाद जॉइंट अकाउंट का क्या होता है?
पार्टनर की मृत्यु के बाद ‘Either or Survivor’ मोड वाला जॉइंट अकाउंट एक बड़ा सहारा बनता है, क्योंकि जीवित पार्टनर बिना किसी रुकावट के खाते को ऑपरेट कर सकता है। इससे घर के बिल और EMI जैसे जरूरी भुगतान रुकते नहीं हैं। हालांकि, यहाँ एक जरूरी कानूनी पेच है: बैंक द्वारा जीवित पार्टनर को पैसा देना उसे उस पैसे का ‘पूर्ण मालिक’ नहीं बना देता। यदि मृतक पार्टनर के अन्य कानूनी वारिस (जैसे बच्चे या माता-पिता) हैं, तो वे उत्तराधिकार कानून के तहत उस पैसे पर अपना दावा कर सकते हैं। बैंक का काम सिर्फ फंड ट्रांसफर करना है, वह मालिकाना हक से जुड़े पारिवारिक विवादों का निपटारा नहीं करता।
जॉइंट अकाउंट में भी नॉमिनी है जरूरी
अक्सर कपल्स को लगता है कि जॉइंट अकाउंट होने पर नॉमिनी (Nominee) की जरूरत नहीं है, क्योंकि एक के न रहने पर दूसरा पैसा निकाल ही लेगा। लेकिन यह एक बड़ी गलतफहमी है। नॉमिनी का असली महत्व तब पता चलता है जब दोनों खाताधारकों के साथ कोई अनहोनी हो जाए। ऐसी स्थिति में, नॉमिनी होने से बैंक को स्पष्ट निर्देश मिलता है कि पैसा किसे सौंपना है। बिना नॉमिनेशन के, आपके परिवार को लंबी कानूनी लड़ाई, ‘सक्सेशन सर्टिफिकेट’ और ढेर सारी कागजी कार्रवाई से गुजरना पड़ सकता है। यह एक छोटा सा कदम आपके अपनों को भविष्य के बड़े आर्थिक तनाव से बचा सकता है।
क्या पार्टनर की गलती आपको पड़ेगी भारी?
अक्सर लोगों को लगता है कि जॉइंट अकाउंट खोलने से उनके क्रेडिट स्कोर (CIBIL) आपस में जुड़ जाते हैं, लेकिन ऐसा नहीं है। सेविंग अकाउंट का आपके क्रेडिट स्कोर से सीधा संबंध नहीं होता। हालांकि, सावधानी बरतना जरूरी है क्योंकि अगर इस खाते से जुड़ा चेक बाउंस होता है या ओवरड्राफ्ट (OD) सुविधा का गलत इस्तेमाल होता है, तो बैंक दोनों खाताधारकों को जिम्मेदार ठहरा सकता है। ऐसी स्थिति में कानूनी रिकवरी या विवाद का असर आप दोनों की बैंकिंग इमेज पर पड़ सकता है।









