
अगर सरकार आपको बांस की खेती के लिए 60 हजार रुपये दे दे और कुल लागत का 50% बोझ खुद उठा ले, तो किसान भाई क्या कहेंगे? बिहार सरकार ने राष्ट्रीय बांस मिशन के तहत यही तोहफा दिया है। कम पानी, कम देखभाल और लंबे समय तक आय का यह स्रोत अब किसानों की तकदीर बदलने को तैयार है। बांस को ‘हरा सोना’ कहे जाने का राज यही है, 3-5 साल में तैयार, फिर 40 साल तक हर साल कटाई। पारंपरिक खेती के जोखिमों से परेशान किसानों के लिए यह वरदान साबित हो सकता है।
सब्सिडी का पूरा खुलासा
बिहार कृषि विभाग के मुताबिक, एक हेक्टेयर पर बांस लगाने की कुल लागत करीब 1.20 लाख रुपये आती है। इसमें से 50% यानी 60,000 रुपये सीधी सब्सिडी मिलेगी। छोटे-सीमांत किसानों को प्राथमिकता दी गई है। घनी खेती के लिए न्यूनतम 0.04 हेक्टेयर जमीन जरूरी, जबकि अधिकतम 0.20 हेक्टेयर तक ही आवेदन हो सकेगा। खेत की मेड़ पर खेती करने वालों को कम से कम 10 पौधे लगाने होंगे। पति-पत्नी दोनों अलग-अलग जमीन पर अप्लाई कर सकते हैं, बशर्ते जमीन उनके नाम हो।
यह योजना बिहार के 27 जिलों- अररिया, बांका, बेगूसराय, भागलपुर, दरभंगा, पूर्वी-पश्चिमी चंपारण, गोपालगंज, जमुई, कटिहार, किशनगंज, मधेपुरा, मधुबनी, मुंगेर, मुजफ्फरपुर, पूर्णिया, सहरसा, समस्तीपुर, सारण, शिवहर, शेखपुरा, सीतामढ़ी, सिवान, सुपौल और वैशाली- में लागू है। राज्य सरकार का लक्ष्य ग्रामीण रोजगार बढ़ाना और किसानों की आय दोगुनी करना है। बांस सूखा, बाढ़ या अनियमित मानसून में भी टिका रहता है, जो इसे जोखिम-मुक्त बनाता है।
आवेदन प्रक्रिया
किसान भाई घर बैठे horticulture.bihar.gov.in पर जाएं। राष्ट्रीय बांस मिशन सेक्शन में आवेदन फॉर्म भरें। जमीन के कागजात, आधार कार्ड, बैंक डिटेल्स अपलोड करें। जिला स्तर पर सत्यापन के बाद सब्सिडी बैंक खाते में आ जाएगी। प्रमाणित नर्सरी से टिश्यू कल्चर पौधे लें। विभाग की टीम ट्रेनिंग और तकनीकी मदद भी देगी। देरी न करें, क्योंकि सीमित जिलों में जल्द आवेदन बंद हो सकते हैं।
आर्थिक फायदे ATM बनेगा खेत
बांस 3-5 साल में कटाई योग्य हो जाता है। उसके बाद हर साल उत्पादन। एक एकड़ में सही दूरी (5×5 मीटर) पर 400-500 पौधे लगें, तो चौथे साल से लाखों की कमाई। इंटरक्रॉपिंग से पहले सालों में सब्जी या दालें उगाकर अतिरिक्त आय। बाजार में फर्नीचर, कागज, निर्माण, हस्तशिल्प और बांस-आधारित प्लाईवुड की मांग आसमान छू रही। प्रति क्विंटल 2-3 हजार रुपये मिलते हैं। पर्यावरणीय लाभ भी कम नहीं- मिट्टी बांधता है, कार्बन सोखता है, बाढ़ रोकता है।
उदाहरण के तौर पर, बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के किसान रामविलास ने बांस लगाया। पहले साल लागत का आधा सरकार ने दिया, अब सालाना 2 लाख की बचत। इसी तरह भागलपुर में समूह खेती से महिलाएं आत्मनिर्भर बनीं।
चुनौतियां और समाधान
जागरूकता की कमी और बाजार लिंकेज मुख्य समस्या। लेकिन सरकार FPO (फार्मर प्रोड्यूसर ऑर्गनाइजेशन) और कोल्ड स्टोरेज से जोड़ रही। कोई खास मिट्टी या ज्यादा खाद-पानी नहीं चाहिए। शुरुआती निवेश कम, रिटर्न लंबा। बांस की खेती बिहार के किसानों को स्थायी समृद्धि देगी। सरकार की इस पहल से ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होगी। इच्छुक किसान आज ही आवेदन करें, यह ‘हरा सोना’ आपके खेत का भविष्य है!









