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NI Act Update: चेक बाउंस मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट का बड़ा फैसला! अब ‘तीसरा पक्ष’ नहीं कर सकेगा शिकायत; जानें कानूनी अधिकार

चेक बाउंस के मुकदमों में अब खेल बदल गया है! इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में 'तीसरे पक्ष' की शिकायतों पर रोक लगा दी है। आखिर क्या हैं आपके नए कानूनी अधिकार और कौन कर सकेगा अब केस? पूरी जानकारी के लिए पढ़ें।

By Pinki Negi

NI Act Update: चेक बाउंस मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट का बड़ा फैसला! अब 'तीसरा पक्ष' नहीं कर सकेगा शिकायत; जानें कानूनी अधिकार
NI Act Update

चेक बाउंस के मामलों में अक्सर देखा गया है कि कानूनी पेचीदगियों के कारण मुकदमे सालों तक चलते रहते हैं। इसी संदर्भ में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए यह स्पष्ट किया है कि चेक बाउंस (Section 138) की शिकायत करने का वैध अधिकार किसके पास है। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि कोई भी बाहरी व्यक्ति या ‘तीसरा पक्ष’ शिकायतकर्ता बनकर किसी को अदालत में नहीं घसीट सकता।

क्या था मामला और कोर्ट की टिप्पणी?

कोर्ट ने अपनी सुनवाई के दौरान NI Act की धारा 142 का हवाला दिया। अदालत ने कहा कि कानून बहुत स्पष्ट है—शिकायत केवल वही व्यक्ति दर्ज कर सकता है जिसके नाम पर चेक जारी किया गया है (Payee)।

अदालत ने जोर देकर कहा कि:

  • यदि चेक ‘व्यक्ति A’ के नाम है, तो ‘व्यक्ति B’ सिर्फ इसलिए शिकायत दर्ज नहीं कर सकता कि वह ‘A’ का दोस्त या परिचित है।
  • शिकायतकर्ता को अदालत में यह साबित करना होगा कि वह चेक में नामित व्यक्ति है या चेक का कानूनी रूप से धारक है।

‘तीसरे पक्ष’ की शिकायत अमान्य क्यों?

अक्सर व्यापारिक या निजी रंजिश में लोग दूसरे के चेक का इस्तेमाल कर फर्जी शिकायतें दर्ज करा देते थे। हाई कोर्ट के इस फैसले से ऐसी प्रथाओं पर रोक लगेगी। कोर्ट का मानना है कि चेक बाउंस का अपराध एक व्यक्तिगत क्षति है, इसलिए जो पीड़ित है, केवल वही न्याय की मांग कर सकता है।

चेक बाउंस कानून (Section 138) की मुख्य प्रक्रिया

यदि आपका चेक बाउंस होता है, तो आपको इन चरणों का विस्तार से पालन करना चाहिए:

  1. बैंक मेमो प्राप्त करना: जब बैंक चेक को अनादरित (Dishonor) करता है, तो वह एक ‘रिटर्न मेमो’ देता है जिसमें बाउंस होने का कारण (जैसे- खाते में कम पैसे होना) लिखा होता है।
  2. 30 दिनों के भीतर लीगल नोटिस: मेमो मिलने के 30 दिनों के अंदर आपको विपक्षी पार्टी को रजिस्टर्ड डाक के जरिए लीगल नोटिस भेजना होगा।
  3. 15 दिन का इंतजार: नोटिस मिलने के बाद विपक्षी को 15 दिन का समय भुगतान के लिए देना अनिवार्य है।
  4. शिकायत दर्ज करना: यदि 15 दिन में पैसे नहीं मिलते, तो अगले 30 दिनों के भीतर मजिस्ट्रेट की अदालत में केस दर्ज करना होता है।

क्या कोई प्रतिनिधि केस लड़ सकता है?

यहाँ एक बारीक कानूनी अंतर है जिसे समझना जरूरी है। यदि मुख्य पीड़ित (Payee) खुद अदालत नहीं जा सकता, तो वह अपने ‘पावर ऑफ अटॉर्नी’ (Power of Attorney) धारक के माध्यम से शिकायत कर सकता है। लेकिन, वह प्रतिनिधि केवल शिकायत पेश करने का जरिया होता है, शिकायत का आधार अभी भी ‘मुख्य पीड़ित’ के अधिकार ही होते हैं। बिना कानूनी दस्तावेज के कोई भी तीसरा व्यक्ति शिकायतकर्ता नहीं बन सकता।

इस फैसले का समाज और व्यापारियों पर असर

  • कानूनी सुरक्षा: यह फैसला उन लोगों को सुरक्षा प्रदान करता है जिनके खिलाफ गलत तरीके से चेक बाउंस के मामले दर्ज किए जाते थे।
  • न्यायपालिका का समय: कोर्ट में अनावश्यक मुकदमों की संख्या कम होगी, जिससे वास्तविक पीड़ितों को जल्दी न्याय मिल सकेगा।
  • दस्तावेजीकरण की महत्ता: अब लेनदेन करते समय लोगों को यह ध्यान रखना होगा कि चेक सही व्यक्ति के नाम पर ही जारी हो और कागजी कार्रवाई पूरी हो।
Author
Pinki Negi
GyanOK में पिंकी नेगी बतौर न्यूज एडिटर कार्यरत हैं। पत्रकारिता में उन्हें 7 वर्षों से भी ज़्यादा का अनुभव है। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत साल 2018 में NVSHQ से की थी, जहाँ उन्होंने शुरुआत में एजुकेशन डेस्क संभाला। इस दौरान पत्रकारिता के क्षेत्र में नए-नए अनुभव लेने के बाद अमर उजाला में अपनी सेवाएं दी। बाद में, वे नेशनल ब्यूरो से जुड़ गईं और संसद से लेकर राजनीति और डिफेंस जैसे कई महत्वपूर्ण विषयों पर रिपोर्टिंग की। पिंकी नेगी ने साल 2024 में GyanOK जॉइन किया और तब से GyanOK टीम का हिस्सा हैं।

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