
पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने एक 44 साल पुराने मामले में यह स्पष्ट कर दिया है कि किसी भी महिला को केवल उसके जेंडर या वैवाहिक स्थिति के आधार पर पैतृक संपत्ति से वंचित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने दशकों पुराने ‘रिवाज-ए-आम’ जैसे रीति-रिवाजों को संविधान के खिलाफ बताया है, जो बेटियों के हक को रोकते थे। अदालत के अनुसार, लैंगिक समानता एक मौलिक अधिकार है और कोई भी पुरानी परंपरा कानून से ऊपर नहीं हो सकती, इसलिए बेटियों का संपत्ति पर समान अधिकार बना रहेगा।
विधवा महिलाओं के संपत्ति अधिकार पर कोर्ट का बड़ा फैसला
जस्टिस वीरेंद्र अग्रवाल की बेंच ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि किसी भी विधवा महिला को अपने पति से मिली संपत्ति बेचने या किसी को देने से रोकना असंवैधानिक है। यह मामला 1982 से चल रहा था, जहाँ मेव समुदाय की एक महिला द्वारा बेची गई ज़मीन पर उसके ससुराल वालों ने दावा किया था। हाई कोर्ट ने निचली अदालत के पुराने फैसले को पलटते हुए साफ कर दिया कि संपत्ति पर मालिकाना हक सिर्फ पुरुषों का अधिकार नहीं है; महिलाओं को भी अपनी संपत्ति के इस्तेमाल का पूरा कानूनी हक है।
क्या है रिवाज-ए-आम और विधवाओं पर इसका प्रभाव?
गुड़गांव (अब गुरुग्राम) जिले में ‘रिवाज-ए-आम’ एक पुरानी परंपरा थी, जिसके तहत विधवा महिलाओं को अपने पति की संपत्ति पर सीमित अधिकार ही मिलते थे। इस प्रथा के अनुसार, एक विधवा महिला केवल अपने जीवनकाल तक ही संपत्ति का उपयोग कर सकती थी, लेकिन वह उसे न तो बेच सकती थी और न ही किसी को दान कर सकती थी। ऐसा करने के लिए उसे अपने पति के पुरुष रिश्तेदारों से अनुमति लेनी पड़ती थी। मेव समुदाय के पुरुष इसी पुराने नियम का सहारा लेकर महिलाओं को उनकी संपत्ति के पूरे मालिकाना हक से दूर रखते थे और अपना दावा जताते थे।
संविधान के सामने पुरानी परंपराएं अमान्य
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में यह साफ़ कर दिया है कि ऐसा कोई भी रिवाज जो धर्म या जेंडर के आधार पर महिलाओं के अधिकारों को कम करता है, वह कानूनी रूप से गलत है। कोर्ट ने कहा कि हमारा संविधान (अनुच्छेद 14 और 15) सभी को बराबरी का हक देता है और किसी के भी साथ भेदभाव की अनुमति नहीं देता। अदालत ने जोर देकर कहा कि देश का संविधान किसी भी पुरानी परंपरा या रीति-रिवाज से बहुत ऊपर है, इसलिए केवल महिला होने के आधार पर किसी के अधिकारों को छीना नहीं जा सकता।
विधवा महिलाओं को मिला संपत्ति बेचने का पूर्ण कानूनी अधिकार
हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी विधवा महिला को अपने पति से ऐसी संपत्ति मिली है जो खानदानी (गैर-पैतृक) नहीं है, तो वह उसे अपनी मर्जी और जरूरत के अनुसार बेच सकती है। अदालत ने साफ तौर पर कहा कि ऐसी बिक्री को सिर्फ इसलिए अवैध नहीं माना जा सकता क्योंकि रिश्तेदारों ने इसकी अनुमति नहीं दी थी। कोर्ट के अनुसार, विधवा महिला अपनी विरासत में मिली संपत्ति की मालिक है और वह अपनी इच्छा से इसका फैसला लेने के लिए पूरी तरह सक्षम है। इस मामले में पति के रिश्तेदारों का दखल देना या पहले हक जताना पूरी तरह गलत है।
44 साल पुराने कानूनी विवाद का हुआ अंत
यह कानूनी लड़ाई 1982 में तब शुरू हुई थी, जब मेव समुदाय की एक विधवा महिला ने अपने पति की ज़मीन बेची थी। उस समय महिला के रिश्तेदारों ने ‘रिवाज-ए-आम’ का हवाला देकर इसे अवैध बताया और दावा किया कि वह सिर्फ ज़मीन का उपयोग कर सकती है, उसे बेच नहीं सकती। शुरुआत में निचली अदालत ने रिश्तेदारों की बात मानी थी, लेकिन अब हाई कोर्ट ने उस पुराने फैसले को पूरी तरह रद्द कर दिया है। कोर्ट ने साफ कर दिया कि वह ज़मीन खानदानी (पैतृक) नहीं थी और महिला को उसे बेचने का पूरा कानूनी अधिकार था।
मामले का घटनाक्रम
| वर्ष | स्थिति |
| 1982 | विवाद की शुरुआत: महिला ने ज़मीन बेची, रिश्तेदारों ने कोर्ट में चुनौती दी। |
| निचली अदालत | शुरुआत में पुरानी परंपरा (रिवाज-ए-आम) के आधार पर रिश्तेदारों के पक्ष में फैसला। |
| 2026 (वर्तमान) | हाई कोर्ट का फैसला: निचली अदालत का आदेश रद्द; महिला का मालिकाना हक बरकरार। |









