
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा जारी ‘समानता नियम 2026’ को लेकर शिक्षा जगत और राजनीति में हलचल तेज हो गई है। इस कानून का मुख्य उद्देश्य कॉलेजों और यूनिवर्सिटीज में हर वर्ग के छात्रों और कर्मचारियों को बराबरी का हक दिलाने के लिए ‘समानता कोषांग’ (Equality Cells) बनाना है।
जहाँ एक ओर सवर्ण वर्ग इस बदलाव का कड़ा विरोध कर रहा है, वहीं दूसरी ओर पूर्व मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य जैसे नेता इसके समर्थन में खुलकर सामने आ गए हैं। बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट के इस्तीफे ने इस विवाद को और हवा दे दी है, जिसके कारण फिलहाल कई राजनीतिक दल इस संवेदनशील मुद्दे पर संभलकर अपनी प्रतिक्रिया दे रहे हैं।
स्वामी प्रसाद मौर्य ने उठाई आवाज़: ‘UGC कानून सामाजिक न्याय के लिए जरूरी’
पूर्व मंत्री और अपनी जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष स्वामी प्रसाद मौर्य ने यूजीसी के नए नियमों का पुरजोर समर्थन किया है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर अपनी बात रखते हुए उन्होंने शिक्षा व्यवस्था में पिछड़े और वंचित वर्गों के साथ हो रहे भेदभाव पर कड़ा प्रहार किया है। उनके बयान के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
- सामाजिक न्याय का लक्ष्य: उन्होंने कहा कि UGC का मूल उद्देश्य शिक्षा में समानता लाना था, लेकिन वर्तमान में SC, ST और OBC वर्ग के साथ सुनियोजित तरीके से अन्याय किया जा रहा है।
- खाली पड़े आरक्षित पद: मौर्य ने आरोप लगाया कि विश्वविद्यालयों में आरक्षित वर्गों के पदों को जानबूझकर नहीं भरा जा रहा है ताकि इस वर्ग के लोग आगे न बढ़ सकें।
- आर्थिक बाधाएं: उन्होंने स्कॉलरशिप और फेलोशिप रोके जाने का मुद्दा उठाते हुए इसे छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ बताया।
- अस्थायी नियुक्तियों में अनदेखी: उनके अनुसार, एडहॉक (Ad-hoc) और गेस्ट फैकल्टी की भर्तियों में आरक्षण के नियमों को पूरी तरह से कुचला जा रहा है, जिससे सामाजिक संतुलन बिगड़ रहा है।
स्वामी प्रसाद मौर्य ने रोस्टर सिस्टम पर उठाए गंभीर सवाल
पूर्व मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य ने यूजीसी के नए समानता कानून का समर्थन करते हुए विरोधियों पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि आरक्षण के रोस्टर सिस्टम के साथ की जा रही छेड़छाड़ सीधे तौर पर संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 16 का उल्लंघन है।
मौर्य ने उन लोगों को घेरा जो ‘हिंदू एकता’ की बात तो करते हैं, लेकिन जब पिछड़ों और दलितों को हक देने की बात आती है, तो वे ही सबसे पहले विरोध में खड़े हो जाते हैं। उन्होंने कड़ा सवाल पूछा कि क्या हक मांगते समय SC, ST और OBC वर्ग के लोगों को हिंदू नहीं माना जाता? उनके अनुसार, यह विरोध न केवल सामाजिक न्याय के खिलाफ है, बल्कि संविधान द्वारा दिए गए बराबरी के अधिकारों की खुली हत्या है।
UGC का नया नियम
देशभर के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में 15 जनवरी 2026 से यूजीसी का नया ‘समानता रेगुलेशन’ प्रभावी हो गया है। इस नए कानून की सबसे खास बात यह है कि अब जातिगत भेदभाव की परिभाषा का दायरा बढ़ा दिया गया है, जिसमें अनुसूचित जाति (SC) और जनजाति (ST) के साथ-साथ अब अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को भी शामिल किया गया है।
इसका मतलब है कि अब OBC छात्र और कर्मचारी भी भेदभाव के खिलाफ ‘समानता कोषांग’ में शिकायत दर्ज करा सकेंगे। हालांकि, इस बदलाव के लागू होते ही सोशल मीडिया पर अगड़ी जातियों के संगठनों ने इसके खिलाफ मोर्चा खोल दिया है, जिससे इस कानून को लेकर एक नई बहस छिड़ गई है।
UGC कानून पर बढ़ता विवाद
यूजीसी के नए नियमों के अनुसार, यूनिवर्सिटीज में बनने वाले ‘समानता कोषांग’ का मुख्य उद्देश्य दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्ग (SC, ST, OBC) के लोगों को भेदभाव से बचाना है। इसका सीधा अर्थ यह है कि सवर्ण वर्ग को छोड़कर अन्य सभी वर्गों के छात्र और कर्मचारी यहाँ अपनी शिकायतें दर्ज करा सकेंगे।
इस कानून का विरोध सबसे पहले यूपी के गाजियाबाद से शुरू हुआ, जहाँ यति नरसिंहानंद गिरि ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की कोशिश की। अब बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री के इस्तीफे ने इस चिंगारी को और हवा दे दी है। विरोध कर रहे समूहों का तर्क है कि यह नियम एक विशेष वर्ग (सवर्ण) को सुरक्षा के दायरे से बाहर रखता है, जिससे विवाद और गहराता जा रहा है।









