
भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच चल रही बातचीत अब एक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ी है। यूरोप के वरिष्ठ अधिकारी और व्यापारिक प्रतिनिधि आज दिल्ली पहुंच रहे हैं, जिसे “मदर ऑफ ऑल डील” कहा जा रहा है। यह असल में एक मुक्त व्यापार समझौता (FTA) है, जो दोनों तरफ के बाजारों को नए दौर में धकेल सकता है।
यह समझौता इतना खास क्यों?
भारत और 27 देशों वाले यूरोपीय संघ के बीच यह FTA व्यापारिक बाधाओं को कम करने, टैरिफ घटाने और निवेश को बढ़ावा देने पर फोकस करता है। दोनों तरफ के नीति निर्माता चाहते हैं कि भारतीय उत्पादों को यूरोपीय बाजार में आसानी से एंट्री मिले और यूरोपीय कंपनियां भारत में आकर लंबी अवधि के लिए निवेश कर सकें। इससे दोनों तरफ की अर्थव्यवस्थाओं को फायदा मिलेगा, लेकिन भारत के लिए यह खास तौर पर एक गेम–चेंजर हो सकता है।
भारत के लिए आर्थिक फायदे
इस संभावित डील के सफल होने से भारतीय निर्यात को बड़ा बूस्ट मिल सकता है। कपड़ा, कृषि उत्पाद, फार्मास्यूटिकल्स, इंजीनियरिंग गुड्स और आईटी सेवाएं जैसे सेक्टर यूरोपीय बाजार में और ज्यादा प्रतिस्पर्धी हो सकते हैं। आज भी यूरोप में कई भारतीय उत्पादों पर काफी टैरिफ लगता है, जिससे वे महंगे लगते हैं। FTA से इन टैरिफ में कटौती होगी, जिससे भारतीय निर्यात बढ़ेगा और देश की GDP में भी अच्छी ग्रोथ दिख सकती है। साथ ही, नए उद्योग और सेवा क्षेत्र में रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे।
रणनीतिक साझेदारी का नया आयाम
यह समझौता सिर्फ व्यापार तक सीमित नहीं है। यूरोपीय अधिकारियों का यह दौरा रक्षा, क्लीन एनर्जी और टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में सहयोग को भी मजबूत करने का मौका दे रहा है। ग्रीन हाइड्रोजन, सोलर और विंड एनर्जी जैसे क्षेत्रों में भारत–यूरोप की पार्टनरशिप आगे बढ़ सकती है। सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स और सप्लाई चेन के मामले में भी दोनों तरफ की कंपनियां आपस में जुड़ सकती हैं। यह भारत को “चाइना–प्लस–वन” सप्लाई चेन का हिस्सा बनाने में मदद करेगा।
वैश्विक निवेश और ‘मेक इन इंडिया’ को तेजी
यूरोपीय संघ की कई बड़ी कंपनियां भारत में निवेश के लिए तैयार हैं। इस FTA से विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) की रफ्तार और तेज हो सकती है। जैसे–जैसे यूरोपीय ब्रांड भारत में प्लांट लगाएंगे, लोकल मैन्युफैक्चरिंग बढ़ेगी और ‘मेक इन इंडिया’ को असली मायने मिलेंगे। इससे न सिर्फ रोजगार बढ़ेगा, बल्कि भारत एशिया का एक बड़ा निर्यात हब भी बन सकता है।
क्या चुनौतियां भी हैं?
हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। इस डील में कुछ संवेदनशील क्षेत्र जैसे कृषि और डेयरी अभी पूरी तरह शामिल नहीं हैं, क्योंकि दोनों तरफ किसानों और छोटे उत्पादकों की चिंताएं हैं। भारत की ओर से कार, वाइन, स्पिरिट्स और कुछ इलेक्ट्रॉनिक्स पर टैरिफ को लेकर सावधानी बरती जा रही है, ताकि घरेलू उद्योग को झटका न लगे। इसलिए टैरिफ कटौती धीरे–धीरे और चरणबद्ध तरीके से होने की संभावना है।
जनता के लिए क्या मायने?
अगर यह समझौता अंतिम रूप से तय हो जाता है, तो भारतीय उपभोक्ताओं को यूरोप के उत्पादों के लिए कम कीमत पर एक्सेस मिल सकता है, जबकि निर्यातकों को बड़ा बाजार मिलेगा। सरकार की जिम्मेदारी यह होगी कि घरेलू उद्योगों को इस नई प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार किया जाए। आप इस समझौते की प्रगति और आधिकारिक घोषणाओं के लिए PIB India और Ministry of Commerce and Industry की वेबसाइट पर लाइव अपडेट्स देख सकते हैं।









