
वैश्विक ऊर्जा बाजार में तनाव और कच्चे तेल के भाव के 115 डॉलर प्रति बैरल के पार जाने के बीच अमेरिका ने एक ऐतिहासिक ‘यू-टर्न’ लिया है। ट्रंप प्रशासन ने समुद्र में फंसे करीब 14 करोड़ (140 मिलियन) बैरल ईरानी कच्चे तेल पर लगे प्रतिबंधों को अस्थाई तौर पर, लगभग 30 दिनों के लिए, हटाने की घोषणा की है। भारत, जो अपनी लगभग 90 फीसदी तेल आवश्यकताओं के लिए आयात पर निर्भर है, इस फैसले का सबसे बड़ा लाभार्थी बनकर उभर सकता है।
अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने फॉक्स न्यूज़ और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर स्पष्ट किया कि युद्ध की वजह से शिपिंग और तेल उत्पादन में आई रुकावट को पाटने के लिए यह कदम उठाया गया है। उनके अनुसार, समुद्र में मौजूद इन जहाजों पर लदे तेल को बाजार में उतारने से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर करोड़ों बैरल तेल की अचानक सप्लाई होगी, जिससे कीमतों पर नियंत्रण हो सकेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे चीन को जो तेल मिल रहा था, वह अब भारत, जापान और मलेशिया जैसे एशियाई देशों की ओर मोड़ा जा सकता है।
भारत के लिए ‘राहत’ और ‘मौका’ दोनों
तेल बाजार विश्लेषक सुमित रितोलिया (केप्लर) के मुताबिक, भारतीय रिफाइनरियां ईरानी ‘लाइट’ और ‘हेवी’ ग्रेड कच्चे तेल को प्रोसेस करने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। 2018 तक भारत का 11.5 फीसदी तेल आयात ईरान से ही होता था। पाबंदियों के बाद यह सप्लाई बंद हो गई, लेकिन अब तकनीकी रूप से रिफाइनरियों को इसे फिर से हांड़िल करने के लिए कोई बड़ा बदलाव नहीं करना पड़ेगा। केवल राजनीतिक और लॉजिस्टिक हरी झंडी की प्रतीक्षा है।
भारत के लिए इसका सबसे बड़ा फायदा ‘लॉजिस्टिक्स’ का है। ईरान के बंदरगाहों से भारत के गुजरात और महाराष्ट्र के तटीय रिफाइनरियों तक तेल के टैंकर पहुंचने में सिर्फ 3-4 दिन लगते हैं और फ्रेट चार्ज बहुत कम होता है। इसका मुकाबला रूसी तेल (जो 10-12 दिन लगते हैं) या अमेरिकी तेल (जो हफ्तों लगते हैं) से नहीं किया जा सकता। ऐसे में अगर ईरान सस्ता तेल ऑफर करता है, तो भारतीय रिफाइनरियां एकमुश्त बड़ी खरीदारी कर अपने स्टॉक को भरा सकती हैं, ठीक उसी तरह जैसे उन्होंने रूसी तेल के साथ किया था।
पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर क्या असर होगा?
मार्केट का सीधा नियम है: सप्लाई अचानक बढ़ने और खरीदारी की जल्दबाजी होने पर भाव गिरते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, अगर यह 14 करोड़ बैरल का कार्गो बाजार में आता है, तो ब्रेंट क्रूड के भाव में 5-8 डॉलर प्रति बैरल की गिरावट संभव है। इसका सीधा असर भारत में थोक तेल की कीमतों पर पड़ेगा, जहां 4-6 रुपये प्रति लीटर तक की राहत मिल सकती है।
हालांकि, फुटकर (रिटेल) स्तर पर पेट्रोल-डीजल के दामों में तुरंत इतनी बड़ी गिरावट की उम्मीद करना गलत होगा। सरकार ने हाल ही में एक्साइज़ ड्यूटी में कटौती की है और तेल कंपनियां पहले से ही घाटे में बेच रही हैं। इसलिए, अगर कीमतों में कमी आती है, तो वह 2-4 सप्ताह में धीरे-धीरे 3-5 रुपये प्रति लीटर तक सीमित रह सकती है, बशर्ते राज्य सरकारें भी अपने VAT में कटौती करें।
चुनौतियां अभी बाकी
फिलहाल, अमेरिकी प्रशासन ने यह स्पष्ट नहीं किया कि यह छूट कैसे लागू होगी और payment, बीमा व शिपिंग जैसी जटिल प्रक्रियाओं को कैसे सरल बनाया जाएगा। राष्ट्रपति ट्रंप ने भी इस पर कोई स्पष्ट समर्थन नहीं दिया, बल्कि कहा कि “हम कीमतों को नियंत्रित रखने के लिए जो जरूरी होगा, करेंगे।” यह भी साफ नहीं है कि अमेरिकी कांग्रेस के द्वारा पास किया गया ईरान पर पाबंदियां सख्त करने वाला नया बिल इस फैसले को प्रभावित करेगा या नहीं।
निष्कर्ष यह है कि अमेरिका का यह कदम भारत के लिए एक ‘सुनहरा मौका’ है। अगर लॉजिस्टिक और भुगतान की व्यवस्था स्पष्ट हो गई, तो भारत रूसी तेल के बाद अब ईरानी सस्ते तेल का लाभ उठाकर अपनी ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत कर सकता है और महंगाई पर काबू पाने में मददगार साबित हो सकता है।









