
मिडिल ईस्ट में अमेरिका-इजराइल गठबंधन और ईरान के बीच छिड़ी खूनी जंग के बीच तेहरान ने बड़ा दांव खेला है। ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने आज सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर युद्ध समाप्ति के लिए तीन सख्त शर्तें रख दीं। उन्होंने इसे “अमेरिका और जायोनी शासन द्वारा भड़काई गई आग” का एकमात्र हल बताया। Al Jazeera की रिपोर्ट के हवाले से खबर है कि ये शर्तें न सिर्फ ईरान की सुरक्षा चाहती हैं, बल्कि वॉशिंगटन को नैतिक रूप से घेर भी रही हैं।
ईरान की तीन प्रमुख शर्तें
पेजेशकियन का बयान साफ है- बिना इनकी स्वीकृति के कोई स्थायी शांति नहीं। पहली शर्त है ईरान के वैध अधिकारों को मान्यता। तेहरान चाहता है कि अमेरिका व इजराइल औपचारिक रूप से स्वीकार करें कि ईरान की संप्रभुता, क्षेत्रीय प्रभाव (हिजबुल्लाह, हूती जैसे प्रॉक्सी) और आंतरिक मामलों में दखलअंदाजी बंद। यह शर्त रेजीम चेंज की कोशिशों पर पूर्ण रोक लगाने जैसी है।
दूसरी मांग है युद्ध नुकसान का हर्जाना। ईरानी सैन्य ठिकानों, परमाणु साइट्स और नागरिक ढांचे पर अमेरिकी-इजराइली हमलों से अरबों डॉलर का नुकसान हुआ। ईरान वित्तीय मुआवजे के साथ पुनर्निर्माण की भरपाई चाहता है। यह प्रतीकात्मक कदम व्हाइट हाउस को “गलत पक्ष” पर खड़ा कर देगा।
तीसरी शर्त सबसे कठिन- भविष्य के हमलों पर अंतरराष्ट्रीय गारंटी। ईरान लिखित समझौता चाहता है जिसमें स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर नौसैनिक घेराबंदी, मिसाइल हमले या साइबर अटैक न हों। बिना “ठोस सुरक्षा आश्वासन” के अस्थायी युद्धविराम नामंजूर। ये शर्तें ईरान को बराबरी का दर्जा दिलाने का प्रयास हैं।
व्हाइट हाउस का सख्त रुख
ट्रंप प्रशासन ने इन मांगों को ठुकरा दिया है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा, “हमारी सैन्य कार्रवाई जारी रहेगी। होर्मुज में तेल टैंकर सुरक्षित रखना प्राथमिकता।” व्हाइट हाउस के प्रवक्ता ने कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी, लेकिन रिपोर्ट्स बताती हैं कि अमेरिका के पास अपनी शर्तें हैं- ईरान में सत्ता परिवर्तन, न्यूक्लियर प्रोग्राम पर पाबंदी और नेतृत्व में हस्तक्षेप।
ट्रंप खुद को “जंग जीतने वाला” साबित करने पर तुले हैं। उनके मुताबिक ईरानी सैन्य क्षमता “नष्ट” हो चुकी। लेकिन अविश्वास की खाई गहरी है। इजराइल तो प्री-एम्प्टिव स्ट्राइक का हक छोड़ने को तैयार नहीं। सऊदी-यूएई जैसे सहयोगी भी ईरान को कमजोर देखना चाहते हैं।
संकट के तीन संभावित अंजाम
विश्लेषकों के मुताबिक जंग के तीन रास्ते हैं। पहला, “कंट्रोल्ड ईरान”- अमेरिका सीमित अभियान से ईरान को इराक मॉडल (90 के दशक) बना दे, नो-फ्लाई जोन और निगरानी के साथ। दूसरा, “आक्रामक ईरान”- जल्दबाजी में युद्ध रोकने से तेहरान मजबूत लौटे, प्रॉक्सी हमले बढ़ाए। तीसरा, “नया ईरान”- आंतरिक विद्रोह से रेजीम गिरे, लेकिन यह सबसे कम संभावित।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर तनाव से तेल कीमतें आसमान छू रही हैं। वैश्विक अर्थव्यवस्था, खासकर भारत जैसे आयातक देशों पर महंगाई का दबाव बढ़ा। फिलहाल समझौता मुश्किल, लेकिन बैकचैनल बातचीत की गुंजाइश। ईरान की शर्तें मानना ट्रंप के लिए राजनीतिक आत्महत्या, न मानना तो लंबा दलदल। मिडिल ईस्ट का महा-संकट कब थमेगा, दुनिया बेचैन।









