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कभी दुनिया के सबसे खूंखार लड़ाके थे डेनमार्क के वाइकिंग्स, आज अमेरिका के सामने क्यों पड़ गए कमजोर?

समुद्र के लुटेरे और अजेय योद्धा माने जाने वाले वाइकिंग्स का देश आज अमेरिका के सामने बेबस क्यों है? जानें डेनमार्क की उस महान सैन्य विरासत की कहानी और आधुनिक युग के वे कड़वे आंकड़े, जो बताते हैं कि क्यों आज का डेनमार्क महाशक्ति अमेरिका से सीधी टक्कर नहीं ले सकता।

By Pinki Negi

कभी दुनिया के सबसे खूंखार लड़ाके थे डेनमार्क के वाइकिंग्स, आज अमेरिका के सामने क्यों पड़ गए कमजोर?
दुनिया के सबसे खूंखार लड़ाके

डेनमार्क का इतिहास ‘वाइकिंग्स’ जैसे खूंखार और निडर योद्धाओं से जुड़ा है, लेकिन आज की सैन्य शक्ति के मामले में यह एक छोटा राष्ट्र है। हालांकि डेनमार्क की सेना आधुनिक हथियारों और उच्च तकनीक से लैस है, लेकिन दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति अमेरिका से इसकी तुलना करना नामुमकिन है।

यदि भविष्य में ग्रीनलैंड पर कब्जे जैसी कोई स्थिति बनती है, तो डेनमार्क की सेना अकेले अमेरिका का मुकाबला लंबे समय तक नहीं कर पाएगी। उसकी सैन्य रणनीति पूरी तरह से नाटो (NATO) गठबंधन और रक्षा समझौतों पर टिकी है। अमेरिका के विशाल परमाणु बेड़े, वायुसेना और नौसेना के सामने डेनमार्क की रक्षा क्षमताएं केवल प्रतीकात्मक प्रतिरोध तक ही सीमित रह सकती हैं।

महाशक्ति अमेरिका के सामने कहाँ ठहरता है डेनमार्क?

डेनमार्क और अमेरिका की सैन्य ताकत के बीच का अंतर ज़मीन और आसमान जैसा है। जहाँ अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य महाशक्ति है, वहीं डेनमार्क की सेना संख्या के मामले में काफी छोटी है। अमेरिका के पास करीब 13 लाख सक्रिय सैनिक हैं, जो डेनमार्क के मात्र 21 हजार सैनिकों के मुकाबले लगभग 60 गुना ज्यादा हैं।

आसमान की जंग में भी यह फासला साफ दिखता है; अमेरिका 13,000 से अधिक विमानों के साथ हवा पर राज करता है, जबकि डेनमार्क के पास केवल 117 एयरक्राफ्ट का छोटा सा बेड़ा है। यह आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि बिना किसी अंतरराष्ट्रीय सहयोग (जैसे NATO) के, डेनमार्क के लिए अमेरिका जैसी शक्ति का सामना करना व्यावहारिक रूप से असंभव है।

अमेरिका और डेनमार्क की सैन्य शक्ति का बड़ा अंतर

थल सेना और नौसेना के मोर्चे पर भी अमेरिका और डेनमार्क की ताकत के बीच एक बहुत बड़ी खाई है। जहाँ भारी टैंकों की बात आती है, डेनमार्क के पास केवल 44 टैंक हैं, जबकि अमेरिका की बख्तरबंद शक्ति 4640 टैंकों के विशाल बेड़े के साथ दुनिया को चुनौती देती है।

समुद्र में भी यही स्थिति बनी हुई है; डेनमार्क के पास अपनी सीमाओं की रक्षा के लिए 50 जहाज (Ships) हैं, तो वहीं अमेरिका 440 जहाजों की विशाल नौसेना के साथ दुनिया के हर कोने में अपनी धाक जमाए हुए है। ये आंकड़े साफ दर्शाते हैं कि पारंपरिक युद्ध की स्थिति में डेनमार्क की सैन्य शक्ति अमेरिका के विशाल सैन्य तंत्र के सामने बहुत सीमित है।

124 गुना ताकतवर अमेरिका और ‘नाटो’ की सुरक्षा का कवच

सैन्य ताकत सिर्फ हथियारों या सैनिकों से नहीं, बल्कि उस पर होने वाले खर्च (Defense Budget) से भी तय होती है। अमेरिका का रक्षा बजट डेनमार्क के मुकाबले लगभग 124 गुना बड़ा है, जो इसे दुनिया की सबसे खतरनाक सैन्य मशीन बनाता है। अगर कभी सीधी टक्कर की नौबत आई, तो डेनमार्क की आधुनिक तकनीक भी अमेरिका के बेहिसाब संसाधनों के सामने टिकना मुश्किल होगा। हालांकि, ग्रीनलैंड को लेकर मौजूदा तनाव के बावजूद युद्ध की संभावना न के बराबर है क्योंकि:

  • नाटो (NATO) का बंधन: दोनों देश नाटो के सदस्य हैं, जहाँ ‘आर्टिकल 5’ के तहत एक-दूसरे की रक्षा का वादा है। किसी सदस्य देश पर हमला पूरे गठबंधन पर हमला माना जाता है।
  • साझा सैन्य इतिहास: डेनमार्क के सैनिक दशकों से अमेरिकी सेना के साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़ते रहे हैं।
  • कूटनीतिक समाधान: डेनमार्क के प्रधानमंत्री और अमेरिकी अधिकारी फिलहाल बातचीत के जरिए मतभेदों को सुलझाने में जुटे हैं।
Author
Pinki Negi
GyanOK में पिंकी नेगी बतौर न्यूज एडिटर कार्यरत हैं। पत्रकारिता में उन्हें 7 वर्षों से भी ज़्यादा का अनुभव है। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत साल 2018 में NVSHQ से की थी, जहाँ उन्होंने शुरुआत में एजुकेशन डेस्क संभाला। इस दौरान पत्रकारिता के क्षेत्र में नए-नए अनुभव लेने के बाद अमर उजाला में अपनी सेवाएं दी। बाद में, वे नेशनल ब्यूरो से जुड़ गईं और संसद से लेकर राजनीति और डिफेंस जैसे कई महत्वपूर्ण विषयों पर रिपोर्टिंग की। पिंकी नेगी ने साल 2024 में GyanOK जॉइन किया और तब से GyanOK टीम का हिस्सा हैं।

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