
बरेली के आंवला क्षेत्र में मतदाता सूची के सत्यापन के दौरान एक महिला की मैपिंग साल 2003 के रिकॉर्ड से नहीं मिल पाई, जिसके बाद चुनाव आयोग ने उन्हें नोटिस जारी किया। सुनवाई के दौरान महिला की ओर से सामान्य निवास प्रमाण पत्र पेश किया गया, जिसे चुनाव आयोग के सख्त नियमों का हवाला देते हुए स्वीकार नहीं किया गया। अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि वर्तमान निर्देशों के अनुसार निवास प्रमाण पत्र को पहचान के ठोस आधार के रूप में नहीं माना जा सकता। फिलहाल, महिला को अपनी नागरिकता और पते से जुड़े अन्य पुख्ता दस्तावेज पेश करने के लिए अगली तारीख दे दी गई है।
निवास प्रमाण पत्र पर असमंजस
उत्तर प्रदेश में लाखों मतदाताओं के सामने एक अजीब संकट खड़ा हो गया है। चुनाव आयोग ने अपनी सूची में ‘स्थायी निवास प्रमाण पत्र’ को मान्यता दी है, लेकिन राज्य में अब केवल ‘सामान्य निवास प्रमाण पत्र’ ही जारी किए जाते हैं। यही प्रमाण पत्र छात्रों की स्कॉलरशिप से लेकर पेंशन और अन्य सभी सरकारी योजनाओं में मान्य है, मगर चुनाव आयोग की मैपिंग प्रक्रिया में इसे स्वीकार नहीं किया जा रहा है।
जिलाधिकारी स्तर के अधिकारियों का भी मानना है कि जब सरकार केवल एक ही तरह का निवास प्रमाण पत्र जारी कर रही है, तो आयोग द्वारा उसे ठुकराने से आम जनता के लिए अपनी नागरिकता और पता साबित करना मुश्किल हो गया है।
सरकारी उलझन में फंसा आम आदमी
उत्तर प्रदेश में मतदाताओं के सामने एक बड़ा संकट खड़ा हो गया है। एक तरफ लेखपालों और तहसील प्रशासन का कहना है कि अब केवल ‘सामान्य निवास प्रमाणपत्र’ ही जारी किए जाते हैं, वहीं दूसरी ओर चुनाव आयोग केवल ‘स्थायी निवास प्रमाणपत्र’ की मांग कर रहा है। स्थानीय अधिकारियों के अनुसार, मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि सामान्य निवास प्रमाणपत्र को स्वीकार न किया जाए। इस प्रशासनिक टकराव के कारण वर्षों से प्रदेश में रह रहे आम लोग परेशान हैं, क्योंकि उनके पास वही दस्तावेज हैं जो राज्य सरकार जारी करती है, लेकिन चुनाव आयोग उन्हें अपर्याप्त मान रहा है।
क्यों मान्य नहीं है सामान्य निवास प्रमाणपत्र?
उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी नवदीप रिणवा ने इस विवाद पर स्थिति स्पष्ट करते हुए बताया है कि सामान्य निवास प्रमाणपत्र केवल 5-6 महीने कहीं रहने पर ही जारी किया जा सकता है। निर्वाचन आयोग का उद्देश्य मतदाता की स्थायी पहचान और नागरिकता का सत्यापन करना है, जो इस प्रमाणपत्र से पूरा नहीं होता।
उन्होंने साफ किया कि ड्राफ्ट मतदाता सूची के सत्यापन (मैपिंग) के दौरान जिन लोगों को नोटिस मिला है, उन्हें आयोग द्वारा तय सूची के अनुसार ही दस्तावेज देने होंगे। चूंकि उस सूची में ‘स्थायी निवास प्रमाणपत्र’ का जिक्र है और ‘सामान्य निवास प्रमाणपत्र’ उसमें शामिल नहीं है, इसलिए इसे आधार नहीं माना जा सकता।
इन 13 दस्तावेजों से साबित होगी आपकी पहचान
चुनाव आयोग द्वारा वोटर लिस्ट मैपिंग और पहचान सत्यापन के लिए मान्य 13 दस्तावेजों की सूची यहाँ दी गई है:
- सरकारी पहचान पत्र: केंद्र या राज्य सरकार और सार्वजनिक उपक्रमों द्वारा जारी नियमित कर्मचारी आईडी या पेंशन भुगतान आदेश (PPO)।
- पुराने आधिकारिक रिकॉर्ड: 1 जुलाई 1987 से पहले बैंकों, डाकघर, LIC या स्थानीय प्राधिकरणों द्वारा जारी कोई भी पहचान पत्र या अभिलेख।
- जन्म प्रमाण पत्र: सक्षम अधिकारी द्वारा जारी किया गया आधिकारिक बर्थ सर्टिफिकेट।
- पासपोर्ट: भारत सरकार द्वारा जारी वैध पासपोर्ट।
- शैक्षणिक प्रमाण पत्र: मान्यता प्राप्त बोर्ड या विश्वविद्यालय द्वारा जारी मैट्रिकुलेशन (10वीं) या अन्य मार्कशीट।
- स्थायी निवास प्रमाण पत्र: राज्य के सक्षम अधिकारी द्वारा जारी स्थायी निवास प्रमाण पत्र (सामान्य निवास मान्य नहीं)।
- जाति प्रमाण पत्र: सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी OBC, SC या ST प्रमाण पत्र।
- आधार कार्ड: आधार कार्ड के संबंध में आयोग द्वारा 9 सितंबर 2025 को जारी विशेष निर्देशों के अनुसार।
- जमीन/मकान के कागज: सरकार द्वारा जारी किया गया कोई भी भूमि या मकान आवंटन प्रमाण पत्र।
- परिवार रजिस्टर: राज्य या स्थानीय निकायों द्वारा तैयार किया गया आधिकारिक परिवार रजिस्टर।
- वन अधिकार प्रमाण पत्र: वन क्षेत्र में रहने वालों के लिए जारी किया गया अधिकार पत्र।
- NRC रिकॉर्ड: राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर की प्रति (जहाँ लागू हो)।
- बिहार SIR अंश: 1 जुलाई 2025 की संदर्भ तिथि के अनुसार बिहार SIR की मतदाता सूची का हिस्सा।









