
उत्तर प्रदेश की बुनियादी शिक्षा प्रणाली को जाली दस्तावेजों के दीमक से बचाने के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक और कड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने प्रदेश के हजारों असिस्टेंट टीचरों के दस्तावेजों की प्रामाणिकता पर सवाल उठाते हुए राज्य सरकार को पूरे प्रदेश में ‘क्लीन-अप ऑपरेशन’ चलाने का आदेश दिया है। जस्टिस मंजू रानी चौहान की पीठ ने इसे केवल एक अपराध नहीं, बल्कि शिक्षा की नींव पर प्रहार माना है।
6 महीने में जांच पूरी करने और सैलरी वसूलने का निर्देश
हाईकोर्ट ने प्रमुख सचिव (बेसिक शिक्षा) को स्पष्ट निर्देश (Mandamus) जारी किया है कि अगले 6 महीने के भीतर प्रदेश के सभी संदिग्ध नियुक्तियों की व्यापक जांच पूरी की जाए। कोर्ट ने नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि बार-बार सर्कुलर जारी होने के बावजूद जमीनी स्तर पर अधिकारी कार्रवाई करने में विफल रहे हैं, जिससे जालसाजों के हौसले बुलंद हुए हैं।
लापरवाह अधिकारियों पर भी होगी बड़ी कार्रवाई
इस फैसले की सबसे बड़ी बात सैलरी रिकवरी का आदेश है।
- कठोर कार्रवाई: कोर्ट ने साफ किया है कि यदि कोई शिक्षक जाली कागजों पर नियुक्त पाया जाता है, तो केवल उसकी सेवा समाप्त करना काफी नहीं है। उसने अब तक सरकार से जो भी वेतन और भत्ते लिए हैं, उसकी वसूली की जाएगी।
- जवाबदेही: कोर्ट ने उन अधिकारियों को भी रडार पर लिया है जिनकी नाक के नीचे यह फर्जीवाड़ा वर्षों तक चलता रहा। उनकी मिलीभगत की जांच कर दंडात्मक कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं।
15 साल की सेवा भी नहीं बचा पाई नौकरी
यह आदेश देवरिया की एक शिक्षिका गरिमा सिंह की याचिका पर आया। याची ने तर्क दिया था कि वह 2010 से (लगभग 15 साल) सेवा में है, इसलिए उसकी नियुक्ति रद्द करना गलत है। हालांकि, जब जांच में निवास और शैक्षिक प्रमाण पत्र फर्जी पाए गए, तो कोर्ट ने सख्त टिप्पणी की— “धोखाधड़ी और जालसाजी से मिली कोई भी सुविधा कानून की नजर में शून्य है।”
पारदर्शिता की कमी और छात्रों का भविष्य
कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में छात्रों के हितों को सर्वोपरि बताया। बेंच ने कहा कि जब एक अयोग्य व्यक्ति जाली डिग्री पर शिक्षक बनता है, तो वह एक पूरी पीढ़ी का भविष्य अंधकार में धकेलता है। अधिकारियों की “निष्क्रियता” (Inaction) को कोर्ट ने इस धोखाधड़ी का सबसे बड़ा मददगार बताया है।









