
सदियों पुराने व्यापारिक रास्ते लिपुलेख दर्रे के जरिए भारत-चीन के बीच स्थलीय सीमा व्यापार 6 साल के अंतराल के बाद जून 2026 से फिर शुरू होने जा रहा है। कोविड-19 महामारी और उसके बाद गलवान घाटी के तनाव से बंद यह दर्रा अब केंद्र व राज्य सरकार की समग्र तैयारियों, एनओसी, ट्रैड पास, बैंकिंग, सीमा शुल्क और सुरक्षा व्यवस्था के हर पहलू को ध्यान में रखते हुए दोबारा एक्टिव किया जा रहा है।
तैयारियां पूरी, निर्देश जारी
केंद्र सरकार के दिशा-निर्देशों के बाद पिथौरागढ़ जिला प्रशासन ने व्यापार सत्र-2026 को सुचारू रूप से संचालित करने के लिए सभी विभागों को अलर्ट कर दिया है। विदेश मंत्रालय ने अनापत्ति प्रमाणपत्र (NOC) जारी कर दिया है; इसके बाद केंद्रीय गृह मंत्रालय व वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय ने भी एनओसी दे दी है। जिलाधिकारी आशीष भटगई ने कहा कि जून से सितंबर तक चलने वाले इस व्यापार सत्र की अवधि को मौसम की अनुकूलता पर बढ़ाया भी जा सकता है।
BSNL को सीमा क्षेत्र में नेटवर्क मजबूत करने, गुंजी में शौचालय व अन्य बुनियादी सुविधाएं बनाने, साथ ही ट्रैड पास जारी करने, मुद्रा-विनिमय के लिए बैंक और सीमा शुल्क विभाग की तैयारी पर विशेष निर्देश दिए गए हैं। दोनों देशों के स्थानीय अधिकारियों के संपर्क विवरण साझा किए जाएंगे ताकि समन्वय बेहतर हो सके।
लिपुलेख दर्रा क्या है?
उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में समुद्र तल से लगभग 5,200 मीटर (17,500 फीट) की ऊंचाई पर स्थित लिपुलेख, भारत-चीन-तीनों का त्रि-बिंदु है। यह हिमालयीन पास सदियों से तिब्बती मसाले, ऊन, हर्बल्स और अन्य वस्तुओं के परिवहन का मुख्य मार्ग रहा है। 1954 में इसका आधिकारिक सीमा-व्यापार शुरू हुआ, 1962 के युद्ध के बाद रोक लगा, तो 1991-92 में फिर खुला। 2019 में कोविड की वजह से बंद हुआ और अब 2026 में दोबारा एक्टिव हो रहा है ।
रणनीतिक-आर्थिक महत्व
- भारत के लिए: उत्तराखंड को तिब्बत से जोड़ने वाला एकमात्र सक्रिय गेट-वे; 80 किमी की धारचूला-लिपुलेख सड़क (2020) से सेना व आपदा-राहत की तेज़ पहुंच; कैलाश-मानसरोवर तीर्थ यात्रा का सबसे छोटा मार्ग ।
- चीन के लिए: तिब्बत-भारत कनेक्टिविटी बढ़ाना, सीमावर्ती अर्थव्यवस्था को Stimulate करना; गैर-सैन्य सहयोग के माध्यम से तनाव-नरमी का संकेत ।
- स्थानीय प्रभाव: पिथौरागढ़ के भोटिया समुदाय व सीमांत व्यापारियों को तकाकोट (तिब्बत) की मंडियों से माल वापस लाने की सुविधा; यह पहली बार होगा कि आधारभूत संरचना, बैंकिंग व सीमा शुल्क एक साथ Integrated हों ।
विवाद की छाया, लेकिन व्यापार आगे
नेपाल लिपुलेख, कालापानी व लिंपियाधुरा को अपना कहता है और 2020 के बाद से इस मार्ग पर अपनी संप्रभुता का दावा जताता आया है। हालांकि, भारत 1954 से प्रशासनिक व सैन्य उपस्थिति के आधार पर इसे अपना मानता है और 2025 की अजीत डोभाल-वांग यी वार्ता के बाद व्यापार बहाली पर आगे बढ़ा । नेपाल की आपत्तियां बनी हैं, पर व्यावहारिक सहयोग ने राजनीति को अस्थाई रूप से पीछे धकेल दिया है।
दुनिया पर भू-राजनीतिक संकेत
छोटा व सीमित लिपुलेख व्यापार वैश्विक अर्थव्यवस्था पर सीधे भारी प्रभाव नहीं डालेगा, पर यह संदेश देता है कि भारत-चीन जैसे विशाल पड़ोसी, विवादों के बावजूद सीमावर्ती सहयोग कर सकते हैं। निवेशकों, अंतरराष्ट्रीय मंचों और क्षेत्रीय देशों (नेपाल, भूटान) के लिए यह तनाव-नरमी व व्यावहारिकता का सकारात्मक संकेत माना जा रहा है ।









