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भारत में कारों का स्टीयरिंग ‘राइट साइड’ ही क्यों होता है? इसके पीछे की दिलचस्प वजह जानकर रह जाएंगे हैरान

भारत में कारों का स्टीयरिंग दाईं ओर होता है क्योंकि यहां सड़क की बाईं लेन से ट्रैफिक चलता है। ब्रिटिश काल से चली आ रही यह प्रथा सुरक्षा बढ़ाती है- ओवरटेकिंग में सामने की गाड़ियां साफ दिखती हैं। दुनिया के 76 देशों में यही नियम है, बदलाव महंगा साबित होगा।

By Pinki Negi

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भारत में सड़कों पर दौड़ने वाली ज्यादातर कारों का स्टीयरिंग व्हील दाईं ओर होता है, जो कई लोगों के लिए आश्चर्य का विषय है। खासकर जब अमेरिका या यूरोप जैसे देशों में यह बाईं ओर दिखता है। दरअसल, यह व्यवस्था सड़क के ट्रैफिक नियमों और ऐतिहासिक विरासत से गहराई से जुड़ी हुई है। भारत सहित दुनिया के करीब 76 देशों में वाहन सड़क की बाईं लेन से चलते हैं, जिसके चलते स्टीयरिंग दाईं ओर रखना सबसे व्यावहारिक और सुरक्षित माना जाता है।

ट्रैफिक नियम: बाईं ओर ड्राइविंग की मजबूरी

भारत में मोटर व्हीकल एक्ट के तहत सभी वाहन सड़क की बाईं ओर चलाने का सख्त नियम है। इस व्यवस्था में ड्राइवर को दाईं ओर स्टीयरिंग मिलने से सामने आ रही गाड़ियों और पैदल यात्रियों पर बेहतर नजर पड़ती है। खासकर घुमावदार या संकरी सड़कों पर ओवरटेकिंग के दौरान यह फायदा साफ दिखता है।

ड्राइवर बिना गर्दन मोड़े ही ट्रैफिक का जायजा ले सकता है, जो दुर्घटनाओं को 20-30 प्रतिशत तक कम करने में मददगार साबित होता है। ब्रिटिश काल से चला आ रहा यह नियम आजादी के बाद भी बरकरार रहा, क्योंकि इसे बदलना इंफ्रास्ट्रक्चर, वाहन उद्योग और ड्राइवरों की आदतों के लिहाज से बेहद महंगा साबित होता।

ब्रिटिश राज का गहरा असर

इस स्टीयरिंग पोजिशन की जड़ें मध्यकालीन यूरोप में हैं, जहां घुड़सवार तलवारबाज दाहिनी ओर हमला करने के लिए बाईं ओर सवारी करते थे। ब्रिटेन ने औद्योगिक क्रांति के बाद रेलवे और सड़कें इसी पैटर्न पर बनाईं। भारत में 19वीं सदी के अंत में ब्रिटिशों ने ट्रैफिक नियम लागू किए, जिसमें बाईं ओर ड्राइविंग अनिवार्य थी। 1939 के मोटर वाहन कानून ने इसे औपचारिक रूप दिया। आज भी भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और दक्षिण अफ्रीका जैसे पूर्व ब्रिटिश उपनिवेशों में यही प्रथा है। जापान ने अमेरिकी दबाव में भी इसे नहीं बदला, क्योंकि आर्थिक नुकसान भारी था।

ओवरटेकिंग और सुरक्षा में खास फायदा

दाईं ओर स्टीयरिंग से ड्राइवर को सेंटर लाइन के करीब होने का लाभ मिलता है। ओवरटेकिंग के समय सामने की सड़क साफ दिखती है, जिससे टक्कर की आशंका कम होती है। 1969 की एक ब्रिटिश स्टडी में पाया गया कि लेफ्ट-हैंड ट्रैफिक वाले देशों में हेड-ऑन क्रैश 25 प्रतिशत कम होते हैं। भारत की व्यस्त सड़कों पर, जहां ट्रक-बसें ज्यादा हैं, यह खासतौर पर उपयोगी है। हालांकि, मल्टी-लेन हाईवे पर लेफ्ट स्टीयरिंग वाले आयातित वाहन चुनौती पैदा करते हैं, लेकिन आरटीओ नियमों के तहत इन्हें कन्वर्ट करना पड़ता है।

दुनिया भर में दोहरी व्यवस्था

दुनिया के 163 देशों में से 76 लेफ्ट-साइड ड्राइविंग अपनाते हैं, बाकी राइट-साइड। अमेरिका ने 1776 की आजादी के बाद फ्रांसीसी प्रभाव से राइट-हैंड ट्रैफिक चुना, जबकि चीन ने 1940 के दशक में जापान के कब्जे से प्रेरित होकर इसे बदला। स्वीडन ने 1967 में लेफ्ट से राइट शिफ्ट किया, लेकिन आर्थिक बोझ के कारण ज्यादातर देशों ने अपनी पुरानी प्रथा बरकरार रखी। भारत में बदलाव से ऑटो इंडस्ट्री को अरबों का नुकसान होता, क्योंकि टाटा, मारुति जैसी कंपनियां राइट-हैंड वाहन बनाती हैं।

व्यावहारिकता ही सबसे बड़ा कारण

कुल मिलाकर, भारत में राइट-साइड स्टीयरिंग सुरक्षा, इतिहास और अर्थव्यवस्था का संतुलित मिश्रण है। इसे बदलना न सिर्फ जटिल बल्कि अनावश्यक होगा। जैसे-जैसे स्मार्ट हाईवे बन रहे हैं, पुरानी प्रथा की प्रासंगिकता बनी रहेगी। ड्राइवर्स को इससे मिलने वाली दृश्यता ही सड़क सुरक्षा की कुंजी है। 

Author
Pinki Negi
GyanOK में पिंकी नेगी बतौर न्यूज एडिटर कार्यरत हैं। पत्रकारिता में उन्हें 7 वर्षों से भी ज़्यादा का अनुभव है। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत साल 2018 में NVSHQ से की थी, जहाँ उन्होंने शुरुआत में एजुकेशन डेस्क संभाला। इस दौरान पत्रकारिता के क्षेत्र में नए-नए अनुभव लेने के बाद अमर उजाला में अपनी सेवाएं दी। बाद में, वे नेशनल ब्यूरो से जुड़ गईं और संसद से लेकर राजनीति और डिफेंस जैसे कई महत्वपूर्ण विषयों पर रिपोर्टिंग की। पिंकी नेगी ने साल 2024 में GyanOK जॉइन किया और तब से GyanOK टीम का हिस्सा हैं।

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