
लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। बता दें यह फैसला लिव इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिला के गुजारे भत्ते की मांग पर लिया गया है। यह मामला कोर्ट में तब आया जब एक पुरुष की याचिका को फैमिली कोर्ट ने ख़ारिज कर दिया। आइए इस पूरे मामले की जानकारी जानते हैं।
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केरल हाई कोर्ट सुनाया फैसला
हाल ही में एक मामला सामने आया कि पुरुष और महिला लिव-इन रिलेशनशिप में थे लेकिन अब पुरुष फैमिली कोर्ट में CrPC की धारा 125 के तहत दायर की गई गुजारे भत्ते की मांग को चनौती दे रहा है। इस पर केरल हाई कोर्ट ने पुरुष की याचिका को ख़ारिज कर दिया है। कोर्ट कहता है कि अगर कोई महिला-पुरुष लम्बे समय तक पत्नी-पति की तरह रिश्ते में रहते हैं तो उन्हें क़ानूनी रूप से शादी का प्रमाण देने की आवश्यकता नहीं है और महिला क़ानूनी रूप से पुरुष से गुजारे भत्ते की मांग कर सकती है।
सुप्रीम कोर्ट में चुनौती
इसके बाद पुरुष ने केरल कोर्ट के फैसले को चुनौती देने के लिए सुप्रीम कोर्ट में अपील दी है। बता दें जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की बेंच के सामने पुरुष का कहना है कि लिव-इन रिलेशनशिप में गुजारे-भत्ते की मांग करना गलत है, इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने महिला पार्टनर को नोटिस भेजा है और छह हफ़्तों में उसका जवाब देने के लिए कहा है।
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कानून का क्या है उद्देश्य?
हर अधिकार और न्याय के लिए सरकार ने अलग से कानून बनाए हुए हैं। ठीक इसी तरह CrPC की धारा 125 एक महत्वपूर्ण कानून है। यह कानून उन लोगों के लिए बना है जो अपना खर्च नहीं उठा सकते हैं और उन्हें आर्थिक मदद की जरुरत होती है। इसमें महिलाऐं, बच्चे और बुजुर्ग लोग शामिल होते हैं उन्हें कानून के तहत आर्थिक सहायता मिलती है। इसके तहत यदि गुजारा भत्ता मांगा जाता है तो शादी का सबूत देने की आवश्यकता नहीं होती है। कानून का मेन उद्देश्य बेसहारा लोगों को न्याय दिलाना और उनकी मदद करना है।
