
सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल हाईवे एक्ट, 1956 के तहत जमीन अधिग्रहण के बदले मिलने वाले मुआवजे पर सवाल उठाए हैं। कोर्ट का कहना है कि इस पुराने कानून की कमियों की वजह से उन लोगों को बहुत कम पैसा मिल रहा है जिनकी जमीनें हाईवे के लिए ली गई हैं। दूसरे कानूनों के मुकाबले इन जमीन मालिकों को काफी आर्थिक नुकसान झेलना पड़ रहा है, जिसे कोर्ट ने एक गंभीर समस्या माना है।
कोर्ट ने प्रशासनिक अधिकारियों की योग्यता पर उठाए सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि नेशनल हाईवे एक्ट के तहत मुआवजे के विवाद सुलझाने का जिम्मा कलेक्टर या कमिश्नर जैसे अधिकारियों पर होता है, जो सही नहीं है। कोर्ट के अनुसार, ये अधिकारी प्रशासनिक कार्यों में इतने व्यस्त रहते हैं कि वे मुआवजे की जटिल बारीकियों को ठीक से नहीं समझ पाते। साथ ही, उनमें न्यायिक प्रशिक्षण (Judicial Training) की कमी होती है। फिलहाल, नियम यह है कि ऐसे मामलों को ‘आर्बिट्रेशन’ (मध्यस्थता) के लिए भेजा जाता है, लेकिन कोर्ट इसे न्याय के लिहाज से कमजोर मानता है।
कलेक्टर नहीं दे पा रहे सही न्याय
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि कलेक्टर या कमिश्नर जैसे अधिकारियों के पास जमीन की सही बाजार कीमत और जटिल कानूनी लाभ तय करने का न तो समय होता है और न ही न्यायिक अनुभव। अपनी प्रशासनिक व्यस्तताओं के कारण वे प्रभावित लोगों को उचित हक नहीं दिला पाते। कोर्ट ने इस बात पर भी चिंता जताई कि मुआवजे के फैसलों (अवार्ड) के खिलाफ अपील करने का कानूनी दायरा भी बहुत सीमित है, जिससे पीड़ित पक्ष को अपनी बात रखने का पूरा मौका नहीं मिल पाता।
अदालती सुनवाई vs सरकारी फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 1894 और 2013 के भूमि अधिग्रहण कानूनों के तहत मुआवजे के विवाद अदालतों में सुलझाए जाते हैं, जो ज्यादा बेहतर है। अदालतों के पास जमीन की सही बाजार कीमत तय करने की विशेषज्ञता और निष्पक्षता होती है। साथ ही, इन कानूनों में पीड़ित जमीन मालिकों को फैसले के खिलाफ बड़ी अदालतों में अपील करने के ज्यादा मौके मिलते हैं, जो नेशनल हाईवे एक्ट (NH Act) में नहीं मिलते।
जमीन मालिकों से भेदभाव खत्म करे सरकार
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि 1956 के एक्ट और 2013 के नए एक्ट के तहत जमीन देने वालों के बीच मुआवजे में भारी अंतर करना गलत है। CJI सूर्यकांत की बेंच ने इसे ‘भेदभावपूर्ण’ बताते हुए केंद्र सरकार को सुझाव दिया है कि वह अपनी कानूनी योजना पर फिर से विचार करे। कोर्ट के अनुसार, संविधान के आर्टिकल 300A (संपत्ति का अधिकार) के तहत सभी जमीन मालिकों को समान और निष्पक्ष मुआवजा मिलना चाहिए, ताकि पुराने कानून के तहत जमीन देने वालों में असंतोष न रहे।









