
सुप्रीम कोर्ट ने तलाक से जुड़े एक अहम मामले में शुक्रवार को ऐतिहासिक टिप्पणी करते हुए स्पष्ट कर दिया कि अगर पत्नी खाना नहीं बनाती या घरेलू काम ठीक से नहीं करती, तो पति इसे ‘क्रूरता’ का आधार नहीं बना सकता। कोर्ट ने कहा कि समय बदल चुका है और अब पति को भी रसोई से लेकर कपड़े धोने तक के कामों में हाथ बंटाना चाहिए।
मामला क्या था?
यह टिप्पणी जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस विक्रम नाथ की बेंच ने तब की, जब वे एक पति की अपील पर सुनवाई कर रहे थे। पति ने हिंदू विवाह अधिनियम के तहत ‘मानसिक क्रूरता’ का हवाला देते हुए तलाक की मांग की थी। उसका आरोप था कि उसकी पत्नी घर के काम ठीक से नहीं करती, खाना नहीं बनाती और घरेलू जिम्मेदारियों से जानबूझकर मुंह मोड़ती है। निचली अदालत ने उसकी दलीलों को स्वीकार करते हुए तलाक मंजूर कर लिया था, लेकिन हाई कोर्ट ने उस फैसले को पलट दिया था। अब मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा।
कोर्ट की फटकार
सुनवाई के दौरान जस्टिस संदीप मेहता ने पति से सीधे और स्पष्ट शब्दों में कहा, “आप किसी मेड (नौकरानी) से शादी नहीं कर रहे हैं, आप एक जीवनसाथी (लाइफ पार्टनर) से शादी कर रहे हैं।” उन्होंने जोर देकर कहा कि शादी का मतलब साझेदारी है, न कि एकतरफा सेवा या आदेश पालन। वहीं, जस्टिस विक्रम नाथ ने कहा, “समय अब बदल चुका है। आज के दौर में जब दोनों पार्टनर कामकाजी होते हैं, तो पति को भी खाना बनाने, कपड़े धोने, बर्तन मांजने जैसे घरेलू कामों में हाथ बंटाना चाहिए।”
पुरानी सोच अब नहीं चलेगी
अदालत ने स्पष्ट किया कि पहले की वह सोच, जिसमें पत्नी को केवल घर संभालने वाली और रसोई तक सीमित माना जाता था, अब सही नहीं मानी जा सकती। घरेलू कामों में लापरवाही या उन्हें सही ढंग से न करने को ‘क्रूरता’ का आधार बनाना कानूनी और सामाजिक दोनों दृष्टि से गलत है। कोर्ट ने कहा कि अगर दोनों कामकाजी हैं, तो घरेलू जिम्मेदारियों का बंटवारा होना चाहिए, न कि केवल महिला पर बोझ डाला जाए।
अगली सुनवाई में दोनों पक्ष होंगे मौजूद
इस मामले में कोर्ट ने पति और पत्नी दोनों को अगली तारीख पर व्यक्तिगत रूप से पेश होने का निर्देश दिया है। इससे साफ है कि अदालत केवल कानूनी पहलू ही नहीं, बल्कि दोनों पक्षों के बीच की गई गलतफहमियों को दूर करने और सुलह की कोशिश भी करना चाहती है। विशेषज्ञों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट का यह रुख लैंगिक समानता और आधुनिक विवाह संस्था की भावना के अनुरूप है।
कानूनी पहलू: क्या है ‘क्रूरता’?
कानूनी जानकारों के मुताबिक, हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(ia) के तहत ‘क्रूरता’ को तलाक का आधार माना गया है, लेकिन इसमें शारीरिक हिंसा, लगातार अपमान, जानलेवा धमकी या गंभीर मानसिक उत्पीड़न जैसे गंभीर पहलू शामिल होते हैं। केवल घरेलू काम न करना या खाना न बनाना इस परिभाषा में फिट नहीं बैठता।
सामाजिक प्रभाव और निष्कर्ष
इस फैसले का सामाजिक प्रभाव गहरा होगा। यह न केवल महिलाओं को सुरक्षा देता है, बल्कि पुरुषों को भी यह संदेश देता है कि शादी बराबरी का रिश्ता है। आधुनिक भारत में जहां दोनों पार्टनर करियर बना रहे हैं, वहां घरेलू कामों का बंटवारा होना स्वाभाविक है। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला लैंगिक रूढ़िवादिता को तोड़ने और विवाह को साझेदारी के रूप में देखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगा।
अगली सुनवाई में अब यह देखा जाएगा कि कोर्ट दोनों पक्षों के बीच सुलह कराने में कितना सफल होता है, लेकिन एक बात तय है- अब पत्नी को केवल ‘कुकिंग मशीन’ नहीं, बल्कि ‘लाइफ पार्टनर’ माना जाएगा।









