
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक महत्वपूर्ण जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई के लिए हामी भर दी, जिसमें देश की कानूनी शिक्षा प्रणाली में व्यापक सुधार की मांग की गई है। खासतौर पर, कक्षा 12वीं के बाद पांच वर्षीय एकीकृत LLB कोर्स की अवधि को घटाकर चार वर्ष करने का प्रस्ताव इस याचिका का केंद्रबिंदु है। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने इस मामले को अप्रैल के दूसरे सप्ताह के लिए सूचीबद्ध कर दिया है, जिससे कानूनी शिक्षा के भविष्य पर बहस तेज हो गई है।
याचिका का केंद्रबिंदु
याचिकाकर्ता वरिष्ठ अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय ने दायर इस PIL में न केवल LLB कोर्स की अवधि कम करने बल्कि ‘विधि शिक्षा आयोग’ गठन की भी मांग की है। उनका कहना है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 चार वर्षीय स्नातक पाठ्यक्रमों को बढ़ावा देती है, लेकिन बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) ने कानूनी शिक्षा की संरचना पर पुनर्विचार नहीं किया।
उपाध्याय ने तर्क दिया कि अमेरिका, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया जैसे कई विकसित देशों में LLB चार वर्षीय होता है, जो व्यावहारिक प्रशिक्षण पर अधिक जोर देता है। भारत का मौजूदा पांच वर्षीय इंटीग्रेटेड कोर्स (BA LLB/BCom LLB आदि) सैद्धांतिक ज्ञान तो भरपूर देता है, लेकिन कोर्टरूम प्रैक्टिस, केस स्टडीज और क्लिनिकल ट्रेनिंग में कमी के कारण सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाओं को यह क्षेत्र आकर्षित नहीं कर पा रहा। उन्होंने कहा, “लॉ की पढ़ाई को उद्योग-केंद्रित बनाने की जरूरत है ताकि ग्रेजुएट्स जॉब मार्केट में तुरंत फिट हो सकें।”
CJI की महत्वपूर्ण टिप्पणियां
सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने कानूनी शिक्षा की गुणवत्ता पर गहरी चिंता जताई। उन्होंने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि पांच वर्षीय LLB की शुरुआत हरियाणा के रोहतक स्थित महर्षि दयानंद यूनिवर्सिटी से हुई थी, जो तब एक क्रांतिकारी कदम था। लेकिन अब समय के साथ बदलाव जरूरी है। CJI ने स्पष्ट किया कि यह मुद्दा केवल न्यायपालिका का नहीं, बल्कि शिक्षाविदों, न्यायविदों, BCI, UGC और नीति विशेषज्ञों का साझा दायित्व है। “हम अपने विचार थोप नहीं सकते।
व्यापक विचार-विमर्श के बाद ही कोई निर्णय लिया जाना चाहिए,” CJI ने बेंच के साथी जस्टिस बागची को संबोधित करते हुए कहा। कोर्ट ने केंद्र सरकार, BCI और UGC से जवाब मांगा है तथा हाई कोर्ट्स, NLUs और कानूनी समुदाय से सुझाव आमंत्रित किए हैं।
पिछली प्रक्रियाओं का इतिहास
यह याचिका कानूनी शिक्षा सुधारों की एक कड़ी है। मई 2025 में जस्टिस विक्रम नाथ की बेंच ने इसी तरह की PIL को BCI के पास भेज दिया था, जबकि अप्रैल 2024 में तत्कालीन CJI डीवाई चंद्रचूड़ ने पांच वर्ष को घटाकर तीन वर्ष करने की मांग को खारिज कर दिया था। उन्होंने तर्क दिया था कि लंबा कोर्स विद्यार्थियों में परिपक्वता लाता है। अब चार वर्षीय मॉडल पर फोकस के साथ मामला मजबूत लग रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सुप्रीम कोर्ट निर्देश देता है तो LLB-LLM एकीकृत कोर्स शुरू हो सकता है, जो कानूनी पेशे को अधिक प्रतिस्पर्धी बनाएगा। BCI का विरोध संभावित है, क्योंकि वर्तमान सिस्टम में 1500 से अधिक लॉ कॉलेज हैं और बदलाव से इंफ्रास्ट्रक्चर पर असर पड़ेगा।
भविष्य की संभावनाएं
कानूनी जगत में इस फैसले का इंतजार है। यदि PIL सफल होती है तो लाखों एस्पिरेंट्स के लिए राह आसान हो जाएगी, लेकिन गुणवत्ता पर कोई समझौता नहीं होगा। CJI की टिप्पणी से साफ है कि सहमति-आधारित सुधार ही रास्ता है। यह कदम NEP 2020 को कानूनी शिक्षा में लागू करने की दिशा में मील का पत्थर साबित हो सकता है।









