
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मार्च में लागू की गई सख्त विदेशी मुद्रा नियम‑सीमाओं ने सीधे तौर पर तो बैंकों की ऑन‑शोर डॉलर‑रुपये पोजिशन को दबोच दिया, लेकिन अप्रत्याशित तरीके से भारतीय कंपनियों के लिए एक बड़ा अर्बिट्रेज अवसर छोड़ गई। 30 मार्च 2026 को नॉन‑डिलीवरेबल फॉरवर्ड्स (NDF) मार्केट में भारतीय कंपनियों की क्लाइंट‑साइड ट्रेडिंग एकाएक 7.54 अरब डॉलर तक पहुँच गई, जो सामान्य औसत की तुलना में लगभग सात गुना ज्यादा थी।
इस दिन ज्यादातर लेनदेन डॉलर बेचने के थे, कंपनियों ने लगभग 7.51 अरब डॉलर बेचे, जबकि खरीदारी सिर्फ 24 मिलियन डॉलर की रही। यह आंकड़ा साफ दिखाता है कि RBI की सख्ती के बाद बैंकों की ओर से पोजिशन घटाने की प्रक्रिया ने ऑन‑शोर और ऑफ‑शोर बाजार के बीच फर्क बढ़ा दिया, जिसका पूरा फायदा उठाने की होड़ कंपनियों के बीच मच गई।
बैंकों की पोजिशन घटाने से खुला अर्बिट्रेज दरवाजा
समझने के लिए मुख्य बात यह है कि भारतीय रिजर्व बैंक ने 27 मार्च को बैंकों की नेट ऑन‑शोर ओपन फॉरेन‑एक्सचेंज पोजिशन (NOP‑INR) पर सख्त सीमा लगा दी, अब प्रति बैंक की अधिकतम सीमा 100 मिलियन डॉलर रखी गई है। इससे पहले बैंक अपनी Tier‑I कैपिटल के 25% तक डॉलर‑रुपये पोजिशन रख सकते थे, जिससे बड़े घरेलू और विदेशी बैंक कई अरब डॉलर की शॉर्ट/लॉन्ग एक्सपोजर बनाकर रुपये‑डॉलर के बीच खेल सकते थे।
जब यह भारी ओपन पोजिशन घटाने की जरूरत पड़ी, तो बैंकों ने ऑन‑शोर बाजार में डॉलर बेचकर इसे तेजी से क्लोज किया, लेकिन साथ ही ही ऑफ‑शोर NDF मार्केट में वही डॉलर खरीदे, ताकि दोनों तरफ की बुक बैलेंस रहे। इससे डॉमेस्टिक फॉरवर्ड और NDF रेट्स के बीच स्प्रेड (फर्क) चौड़ा हो गया, जो कंपनियों के लिए एक तरह का “फ्री अर्बिट्रेज विंडो” बन गया।
कंपनियों का NDF गेम और रुपये पर असर
इस स्प्रेड का फायदा उठाते हुए कई बड़ी कॉर्पोरेट फर्मों ने ऑन‑शोर बाजार से डॉलर खरीदना शुरू किया और उसे NDF मार्केट में बेचकर अपनी भविष्य की करंसी जरूरत को लॉक किया या सट्टेबाजी के रूप में एक्सपोजर लिया। इसी वजह से 30 मार्च को NDF क्लाइंट ट्रेड वॉल्यूम इतना फूटकर आगे निकल गया। इन सभी लेनदेन के बीच रुपये पर भी सीधा
असर दिखा: शुरुआत में रुपये को थोड़ी तेजी मिली, लेकिन बाद में ऑन‑शोर कॉर्पोरेट डॉलर‑डिमांड ने इसे वापस दबोच लिया, और यह अपने अब तक के सबसे निचले स्तरों पर पहुँच गया, जहाँ एक अमेरिकी डॉलर की कीमत 95 रुपये से भी ज्यादा हो गई। इस स्थिति ने यह साबित कर दिया कि RBI की नई सीमाएं चाहे बैंकों की ओपन पोजिशन को काफी हद तक रोक सकती हैं, लेकिन कंपनियों का बढ़ता NDF‑एक्सपोजर रुपये की दिशा को भी अपने रास्ते पर घुमा सकता है।
RBI की नई पाबंदियां और रुपये की स्थिरता
चिंता इसलिए और बढ़ गई कि बढ़ते अर्बिट्रेज खेल और ऑफ‑शोर बाजार का तेजी से बढ़ता विस्तार RBI के करंसी‑स्टेबिलिटी उद्देश्य के लिए खतरा बन सकता है, इसलिए सेंट्रल बैंक ने अपनी सख्ती आगे बढ़ाई। उसने स्थानीय बैंकों को यह निर्देश दिया कि वे न तो रेजिडेंट और न नॉन‑रेजिडेंट को रुपये आधारित NDF कॉन्ट्रैक्ट ऑफर करें, यानी कंपनियों के लिए अब ऑफ‑शोर रुपये‑फ्यूचर का वह सीधा चैनल बंद हो गया। साथ ही RBI ने यह भी प्रतिबंध लगा दिया कि कैंसिल हुए किसी भी फॉरवर्ड कॉन्ट्रैक्ट को कंपनियां फिर से री‑बुक नहीं कर सकतीं, ताकि एक ही डील दोहराकर रिस्क या सट्टाबाजी का खेल न चले।
इन सभी कदमों के चलते रुपये पर ज्यादा दबाव आने की संभावना कम हुई और बाजार की ओर से अगले कुछ दिनों में रुपये में फिर से स्थिरता दिखाई देने लगी, यह लगभग 93 रुपये प्रति अमेरिकी डॉलर के स्तर पर ट्रेड करने लगा। इस तरह RBI की पहले वाली “सख्ती” ने छोटे समय अंतराल में कंपनियों के लिए एक विशाल NDF‑गेम खोल दिया, लेकिन बाद की और सख्त रेगुलेशन ने इस खुले दरवाजे को धीरे‑धीरे बंद करने की दिशा में निशाना लिया है।









