
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को हिला दिया है। ईरान-इजरायल संघर्ष के कारण कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं, जिससे भारत जैसे आयात-निर्भर देश में ईंधन और एलपीजी महंगे होने की आशंका है। ऐसे समय ऊर्जा सुरक्षा पर बहस तेज हो गई है। लाखों भारतीयों के मन में एक सवाल उठ रहा है: अगर मेरी निजी जमीन के नीचे तेल या प्राकृतिक गैस का विशाल भंडार मिल जाए, तो क्या मैं अमीर हो जाऊंगा? क्या सरकार सब छीन लेगी या हिस्सेदारी मिलेगी?
दरअसल, भारत का कानून इस पर स्पष्ट है। प्राकृतिक संसाधन जैसे तेल-गैस राष्ट्रीय संपत्ति हैं, न कि निजी जमीन मालिक की। जमीन ऊपर से आपकी रहती है, लेकिन उसके नीचे छिपे ‘काले सोने’ पर केंद्र सरकार का पूर्ण अधिकार है। ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉर्पोरेशन (ONGC) या रिलायंस जैसी कंपनियां खोज शुरू करती हैं, तो मालिक को मुआवजा मिलता है, लेकिन उत्पादन से सीधा लाभ या रॉयल्टी नहीं।
कौन से नियम लागू?
मुख्य कानून है ऑयलफील्ड्स (रेगुलेशन एंड डेवलपमेंट) एक्ट, 1948। यह केंद्र सरकार को तेल क्षेत्रों का नियमन, लाइसेंस जारी करना और उत्पादन नियंत्रित करने का अधिकार देता है। पेट्रोलियम एंड नेचुरल गैस रूल्स, 1959 खोज, ड्रिलिंग और खनन की प्रक्रिया तय करते हैं। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 297 के तहत समुद्री क्षेत्रों सहित सभी तेल संसाधन सरकारी हैं। हालिया तेल क्षेत्र संशोधन विधेयक 2024 ने निजी निवेश को बढ़ावा दिया, लेकिन मालिकाना हक सरकार के पास ही रहा।
मुआवजा: कितने लाख सालाना?
जमीन अधिग्रहण लैंड एक्विजिशन एक्ट, 1894 के तहत होता है। ONGC ज्यादातर स्थायी अधिग्रहण से बचती है; 33 साल की लीज या वार्षिक किराया तय करती है। असम जैसे राज्यों में शहरी बीघा पर ₹12 लाख और ग्रामीण पर ₹10 लाख सालाना मुआवजा मिलता है। उत्तर प्रदेश के बलिया में हालिया खोज पर चित्तू पांडे परिवार को इसी प्रक्रिया से मुआवजा मिला। असहमति हो तो डिप्टी कलेक्टर या अदालत में अपील का अधिकार है। बाड़मेर (राजस्थान) के किसान उदाहरण हैं, जहां मुआवजा मिला लेकिन करोड़पति कोई नहीं बना।
हकीकत vs सपना
अमेरिका जैसे देशों में जमीन मालिक तेल बेचकर अरबपति बनते हैं, लेकिन भारत में ऐसा नहीं। संसाधनों का राष्ट्रीय हित प्राथमिक है। पश्चिम एशिया संकट के दौर में ये कानून ऊर्जा आत्मनिर्भरता सुनिश्चित करते हैं। फिर भी, किसानों को मुआवजा निष्पक्ष लगे, इसके लिए पारदर्शिता जरूरी। सरकार को नीतियां अपडेट कर अधिक लाभ पहुंचाने पर विचार करना चाहिए।









