
भारत में श्रम कानूनों को सरल, पारदर्शी और देशव्यापी रूप देने के लिए सरकार ने चार श्रम संहिताएं बनाई हैं, जिन्हें लोकप्रिय रूप से “नए लेबर कोड” के नाम से जाना जाता है। इनमें Occupational Safety, Health and Working Conditions (OSHWC) Code, 2020 छुट्टी, लीव एनकैशमेंट और काम के घंटों से जुड़े नियमों को संभालता है। यह व्यवस्था 21 नवंबर 2025 को नोटिफाई की गई थी और अब 1 अप्रैल 2026 से चरणबद्ध तरीके से पूरे देश में लागू हो रही है, हालांकि कुछ राज्य अभी अपने नियम बनाने में देर डाल रहे हैं।
छुट्टी के नियमों में क्या बदलाव?
सबसे बड़ा बदलाव अर्जित छुट्टी (Earned Leave) के हिसाब से आया है। अब पूरे देश में एक जैसा नियम लागू करने की कोशिश की गई है: हर 20 दिन काम करने पर कर्मचारी को 1 दिन की अर्जित छुट्टी मिलेगी, चाहे वह किसी भी राज्य या क्षेत्र में काम कर रहा हो। पहले अलग‑अलग राज्यों में Shops & Establishments Act, Factories Act जैसे कानूनों के आधार पर छुट्टी का नियम अलग‑अलग था, जिससे कर्मचारी और नियोक्ताओं के बीच काफी भ्रम और असमानता थी।
अब नए श्रम संहिता के तहत तय हो गया है कि किसी भी कर्मचारी की अधिकतम 30 दिन की छुट्टी ही अगले साल आगे बढ़ाई जा सकेगी। अगर किसी के पास 30 दिन से ज्यादा छुट्टी जमा हो जाती है, तो वह अतिरिक्त छुट्टी का भुगतान साल के अंत तक करा सकता है। यानी जो छुट्टी इस्तेमाल नहीं होती, वह बर्बाद नहीं होगी बल्कि पैसे के रूप में मिलेगी, जिससे कर्मचारी के “लीव बैलेंस” का दुरुपयोग या नुकसान रोकने का प्रयास है।
लीव एनकैशमेंट का नया फॉर्मूला
लीव एनकैशमेंट मतलब बची हुई छुट्टियों का नकद भुगतान। नए कानून के तहत अगर किसी कर्मचारी के पास एक साल में 30 दिन से ज्यादा छुट्टी जमा हो जाती है तो उस अतिरिक्त छुट्टी का भुगतान उसी साल करना जरूरी होगा। इससे कर्मचारियों को यह फायदा मिलेगा कि उनकी छुट्टियां सिर्फ “दिखावे के लिए” नहीं रखी जाएंगी, बल्कि प्रैक्टिकल तरीके से उन्हें नकदि या छुट्टी के रूप में उपयोग करने का अधिकार मिलेगा।
एक्सपर्ट्स का मानना है कि ग्रेच्युटी और लीव एनकैशमेंट पर नए नियमों की वजह से रिटायरमेंट तक बड़ी रकम जमा हो सकती है, खासकर उन कर्मचारियों के लिए जो लंबे समय तक एक ही कंपनी में टिके रहते हैं।
कौन‑कौन लाभ उठा सकेगा?
यह लाभ सभी कर्मचारियों पर एक साथ लागू नहीं होगा। नए कोड में “श्रमिक” (Worker) की परिभाषा इस तरह तय है कि फैक्ट्री मजदूर, कॉन्ट्रैक्ट वर्कर, फिक्स्ड टर्म कर्मचारी इस दायरे में आते हैं, जबकि मैनेजरियल, प्रशासनिक और उच्च स्तरीय पर्यवेक्षी जिनकी मासिक सैलरी ₹18,000 से ज्यादा है, अक्सर इस श्रेणी से बाहर रहते हैं। यानी इन नियमों का फायदा ज्यादातर बेसिक‑लेवल और नन‑मैनेजरियल कर्मचारियों को मिलेगा, जो अभी तक अलग‑अलग राज्यीय कानूनों के तहत असमान सुरक्षा और लाभ से जूझ रहे थे।
छुट्टी रोकने पर क्या होगा?
नए नियमों में कर्मचारियों के हितों को ध्यान में रखते हुए एक महत्वपूर्ण प्रावधान जोड़ा गया है: अगर कर्मचारी छुट्टी के लिए आवेदन करता है और नियोक्ता उसे मनमाने तरीके से रोक देता है, तो वह छुट्टी खत्म या रद्द नहीं मानी जाएगी। उसे आगे जोड़ दिया जाएगा और बाद में उसे लीव एनकैशमेंट के रूप में भी लिया जा सकेगा। इससे नियोक्ताओं के लिए मनमाने तरीके से छुट्टी रोकने का रास्ता बंद होगा और छुट्टी का उपयोग अधिक संतुलित और पारदर्शी तरीके से हो सकेगा।
एक्सपर्ट्स की राय और अगले कदम
एक्सपर्ट्स का कहना है कि नई श्रम संहिता से नौकरी और छुट्टी दोनों के नियम ज्यादा स्पष्ट और देशव्यापी होंगे, लेकिन पूरी तरह लागू होने के लिए राज्यों को अपने नियम जारी करने होंगे। अभी चरणबद्ध तरीके से नियम लागू हो रहे हैं, जिसके बाद न केवल छुट्टी और लीव कैश बल्कि वेतन संरचना, ग्रेच्युटी और सामाजिक सुरक्षा भी एकसमान मानकों पर आ जाएंगे। अगर आप खुद किसी कंपनी में काम करते हैं तो अपनी सैलरी स्लिप और लीव पॉलिसी को नए श्रम कानून के हिसाब से जांचकर देखना जरूरी है, ताकि आप अपने हक और लाभों से पूरी तरह वाकिफ रहें।









