सड़कों पर तेज रफ्तार और लापरवाही ने एक बार फिर देश को झकझोर दिया है। हाल ही में हुए कई हृदयविदारक हादसों ने साफ संकेत दिया है कि नाबालिगों को वाहन सौंपना अब महंगा पड़ सकता है। जब बच्चा कार या बाइक की चाबी थाम लेता है, तो खतरा सिर्फ सड़क तक सीमित नहीं रहता। माता-पिता की जेल यात्रा भी तय हो जाती है। यह सख्त कानूनी प्रावधान सड़क सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में उठाया गया कदम है, जो हर परिवार के लिए चेतावनी का सबक लेकर आया है।

कानून की सख्ती, कौन लेगा सजा?
मोटर वाहन नियमों के तहत साफ तौर पर कहा गया है कि 18 साल से कम उम्र का कोई भी बच्चा वाहन नहीं चला सकता। अगर ऐसा होता है और हादसा हो जाता है, तो जिम्मेदारी सीधे वाहन मालिक या अभिभावकों पर आती है। तीन साल तक की कैद, भारी जुर्माना और वाहन जब्ती जैसी सजाएं मिलना आम बात हो गई है। नाबालिग को आगे चलकर ड्राइविंग लाइसेंस पाने में भी लंबा इंतजार करना पड़ता है। यह नियम इसलिए बनाया गया ताकि परिवार खुद ही बच्चों को गाड़ी से दूर रखें। पुलिस अब हर मामले में अभिभावकों पर कार्रवाई कर रही है, चाहे बच्चे ने जानबूझकर गाड़ी ली हो या चाबियां लापरवाही से छोड़ दी हों।
हिट एंड रन, भागने की सजा और भी कठोर
अगर दुर्घटना के बाद ड्राइवर मौके से भाग जाता है, तो हाल के संशोधित कानूनों ने सजा को कई गुना बढ़ा दिया है। मौत होने पर दस साल तक की लंबी कैद हो सकती है। नाबालिग के मामले में भी यही नियम लागू होते हैं, लेकिन मुख्य जिम्मेदारी माता-पिता की बन जाती है। ट्रक चालकों के विरोध के बावजूद सरकार ने इन प्रावधानों को पूरी तरह अमल में ला दिया है। सड़क परिवहन विभाग ने स्पष्ट निर्देश जारी किए हैं कि वाहन सीज करना और रजिस्ट्रेशन रद्द करना अनिवार्य होगा। इसका असर दिल्ली, उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में साफ दिख रहा है, जहां सैकड़ों परिवारों को इसकी मार झेलनी पड़ी।
क्यों हो रहे हैं ऐसे हादसे?
12 से 18 साल के किशोरों में वाहन चलाने का शौक तेजी से बढ़ रहा है। सोशल मीडिया पर स्टंट वीडियो बनाने की होड़ ने हालात और बिगाड़ दिए हैं। आंकड़े बताते हैं कि हर साल सैकड़ों हादसे इसी लापरवाही से हो रहे हैं। पुणे और दिल्ली जैसे शहरों में हुए भयावह मामलों ने पूरे देश को जगाया। एक तरफ नाबालिग ने दो जिंदगियां छीन लीं, तो दूसरी तरफ पिता पर हत्या का मुकदमा चल रहा है। स्कूलों तक को निर्देश दे दिए गए हैं कि बच्चों को वाहन न सौंपें। कोर्ट में यह साबित करना पड़ता है कि अभिभावक ने लापरवाही बरती या नहीं, लेकिन सजा से बचना लगभग नामुमकिन है।
परिवारों के लिए जरूरी सलाह
अब समय आ गया है कि हर माता-पिता सतर्क हो जाएं। बच्चे को कभी भी चाबियां न सौंपें, चाहे घर के आसपास ही क्यों न जाना हो। हादसे होने पर तुरंत पुलिस को सूचना दें और एफआईआर दर्ज कराएं। जागरूकता अभियान तेज हो रहे हैं, लेकिन असली बदलाव घर-घर से ही आएगा। सरकार का लक्ष्य सड़क हादसों को आधा करने का है, जिसमें हर नागरिक की भूमिका अहम है। सड़कें तेज रफ्तार की नहीं, सुरक्षित यात्रा की हैं। क्या आप अपने परिवार को इस खतरे से बचा लेंगे?









