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पैतृक संपत्ति पर बहन का हक बरकरार! भाई के नाम रिकॉर्ड या संपत्ति गिरवी रखने से अधिकार खत्म नहीं होता, हाईकोर्ट का फैसला

मद्रास हाईकोर्ट का धमाकेदार फैसला! पैतृक संपत्ति में बहनों का हक खतौनी नाम से खत्म नहीं होता। भाई अकेले गिरवी रखे या कब्जा जमाए, बेटियां coparcener बन जन्म से बराबर मालिक। कभी भी partition suit से हिस्सा लें – 2005 कानून सबको मजबूत अधिकार देता है।

By Pinki Negi

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भारत के गांवों और छोटे शहरों में अक्सर देखा जाता है कि पैतृक जमीन या घर पर भाइयों का कब्जा हो जाता है और बहनें पीछे छूट जाती हैं। लेकिन मद्रास हाईकोर्ट का ताजा फैसला इस पुरानी प्रथा पर करारा प्रहार करता है – राजस्व रिकॉर्ड में नाम न होने से बहनों का हक खत्म नहीं होता। ये फैसला बेटियों को जन्म से ही पैतृक संपत्ति में बराबर का मालिक बनाता है, चाहे भाई कितना भी दबाव बनाए।

राजस्व रिकॉर्ड नाम का खेल नहीं

सबसे पहले तो ये समझ लीजिए कि खतौनी, पट्टा या कोई भी revenue record सिर्फ टैक्स वसूलने का औजार है, मालिकाना हक का सबूत नहीं। कोर्ट ने साफ कहा कि भाई का नाम दर्ज होने मात्र से बहन का हिस्सा गायब नहीं हो जाता। ये रिकॉर्ड possession या ownership साबित नहीं करते, बस सरकारी कागजी कार्रवाई के लिए होते हैं। कई परिवारों में भाई अकेले नाम करवा लेते हैं, लेकिन कानून बहन के जन्मजात अधिकार को मान्यता देता है।

बिना सहमति लोन लेना बेकार

अगर भाई ने बहन की जानकारी या रजामंदी के बिना पूरी पैतृक संपत्ति को बैंक में गिरवी रख दिया और लोन ले लिया, तो भी बहन का हक सुरक्षित रहेगा। कोर्ट ने इसे बेअसर करार दिया – भाई अकेला फैसला नहीं ले सकता। संपत्ति पर सबका बराबर अधिकार है, इसलिए कोई एक हिस्सा बेचे, गिरवी रखे या ट्रांसफर करे, तो बाकी सह-मालिकों को नुकसान नहीं पहुंच सकता। ये प्रावधान बहनों को मजबूत सुरक्षा देता है।

2005 का संशोधन

हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम में 2005 का वो बड़ा संशोधन याद है न, जिसने बेटियों को बेटों के बराबर coparcener का दर्जा दिया? यही कोर्ट का आधार है। जन्म लेते ही बेटी पैतृक संपत्ति (ancestral property) में सह-हकदार बन जाती है। पहले ये अधिकार सिर्फ बेटों तक सीमित था, लेकिन अब बेटियां भी बराबरी का दावा कर सकती हैं। ये बदलाव सदियों की असमानता को तोड़ने वाला कदम है, जो हर हिंदू परिवार पर लागू होता है।

कभी भी मांगें अपना हिस्सा

बहन को इंतजार करने की जरूरत नहीं – वो कभी भी partition suit दायर करके अपना हिस्सा मांग सकती है। भाई ने कितने ही सालों से कब्जा जमाया हो, या रिकॉर्ड अपने नाम करवा लिए हों, फिर भी कोर्ट बंटवारा करवाएगा। ये अधिकार बेटियों को सशक्त बनाता है, खासकर उन मामलों में जहां शादी के बाद हिस्सा भूल जाते हैं। समयबद्धता का कोई बंधन नहीं, बस सही सबूत और कानूनी प्रक्रिया चाहिए।

आगे क्या? लीगल हेल्प कहां से लें

अगर आपकी फैमिली में ऐसा कोई विवाद चल रहा है, तो सीधे वकील से मिलें या National Legal Services Authority (NALSA) की वेबसाइट चेक करें। वो फ्री लीगल एड और सलाह देते हैं। याद रखें, कागजों का खेल अब नहीं चलेगा – कानून बेटियों के साथ खड़ा है। ये फैसला लाखों बहनों के लिए राहत की सांस है, जो सालों से अपने हक के लिए लड़ रही हैं।

Author
Pinki Negi
GyanOK में पिंकी नेगी बतौर न्यूज एडिटर कार्यरत हैं। पत्रकारिता में उन्हें 7 वर्षों से भी ज़्यादा का अनुभव है। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत साल 2018 में NVSHQ से की थी, जहाँ उन्होंने शुरुआत में एजुकेशन डेस्क संभाला। इस दौरान पत्रकारिता के क्षेत्र में नए-नए अनुभव लेने के बाद अमर उजाला में अपनी सेवाएं दी। बाद में, वे नेशनल ब्यूरो से जुड़ गईं और संसद से लेकर राजनीति और डिफेंस जैसे कई महत्वपूर्ण विषयों पर रिपोर्टिंग की। पिंकी नेगी ने साल 2024 में GyanOK जॉइन किया और तब से GyanOK टीम का हिस्सा हैं।

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