
भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी इसरो (ISRO) ने अंतरिक्ष की दुनिया में कई सफलताएं हासिल की हैं, लेकिन कभी-कभी तकनीकी खामियों के कारण मिशन असफल भी हो जाते हैं। हाल ही में ‘PSLV-C62’ मिशन के फेल होने से एक बार फिर करोड़ों रुपये के निवेश पर सवाल उठने लगे हैं। ऐसे मिशनों पर भारी भरकम खर्च होता है, जिससे न केवल आर्थिक नुकसान होता है बल्कि देश की वैज्ञानिक मेहनत को भी झटका लगता है। हालांकि, इन बड़े नुकसानों की भरपाई के लिए विशेष बीमा (Insurance) और बैकअप योजनाएं काम आती हैं, जिससे एजेंसी को फिर से खड़े होने में मदद मिलती है।
इसरो का PSLV-C62 मिशन हुआ विफल
आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा से 16 सैटेलाइट्स को लेकर रवाना हुआ इसरो का PSLV-C62 रॉकेट तकनीकी खराबी के कारण अपने लक्ष्य को पूरा नहीं कर सका। इस मिशन का मुख्य उद्देश्य EOS-N1 (अन्वेषा) और 14 अन्य महत्वपूर्ण सैटेलाइट्स को अंतरिक्ष की कक्षा में स्थापित करना था, ताकि देश की निगरानी (Surveillance) प्रणाली और डेटा सटीकता को और मजबूत किया जा सके।
दुर्भाग्यवश, रॉकेट अपने तीसरे चरण में रास्ता भटक गया और मिशन असफल हो गया। इसरो चीफ ने इस घटना पर संज्ञान लेते हुए जाँच के आदेश दे दिए हैं ताकि विफलता के सटीक कारणों का पता लगाया जा सके।
अंतरराष्ट्रीय सहयोग और DRDO का मुख्य पेलोड
इसरो का PSLV-C62 मिशन न केवल भारत बल्कि दुनिया के कई देशों के लिए महत्वपूर्ण था। इस लॉन्च में DRDO (रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन) मुख्य ग्राहक था, जिसने प्रमुख पेलोड EOS-N1 (अन्वेषा) विकसित किया था। इस मिशन में भारत के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों और निजी संगठनों जैसे ‘स्पेस किड्ज इंडिया’ और ‘सीवी रमन ग्लोबल यूनिवर्सिटी’ की भी भागीदारी थी। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस मिशन में अमेरिका, फ्रांस, यूके और यूएई सहित 11 देशों के संस्थानों का सहयोग शामिल था, जो इसे एक बड़ा वैश्विक अंतरिक्ष अभियान बनाता था।
करोड़ों के नुकसान से निपटने का सुरक्षा कवच
जब करोड़ों की लागत वाला कोई रॉकेट मिशन फेल होता है, तो सबसे बड़ा सवाल उसके वित्तीय नुकसान की भरपाई का होता है। सैटेलाइट्स की भारी कीमत को देखते हुए लॉन्च से पहले ही उनका ‘स्पेस इंश्योरेंस’ (Space Insurance) कराया जाता है।
मिशन के असफल होने पर बीमा कंपनियां नुकसान का बड़ा हिस्सा वहन करती हैं। हालांकि, यह भरपाई हमेशा 100% नहीं होती; भुगतान की अंतिम राशि बीमा पॉलिसी की शर्तों और दोनों पक्षों के बीच होने वाले आपसी समझौते (Negotiation) पर निर्भर करती है। इस तरह, बीमा के जरिए इसरो जैसी स्पेस एजेंसियों के वित्तीय जोखिम को काफी हद तक कम किया जाता है।
मिशन फेल होने का समय तय करता है बीमा की राशि
स्पेस मिशन में बीमा की भरपाई इस बात पर टिकी होती है कि खराबी किस चरण (Stage) में आई है। यदि रॉकेट उड़ान भरते ही दुर्घटनाग्रस्त हो जाता है या ऑर्बिट में पहुँचने से पहले फेल होता है, तो बीमा कंपनियाँ आमतौर पर पूरे नुकसान का भुगतान करती हैं।
लेकिन, यदि सैटेलाइट रॉकेट से सही सलामत अलग हो जाए और उसके बाद तकनीकी खराबी के कारण अपनी कक्षा में सेट न हो पाए, तो नुकसान का बोझ मालिक को उठाना पड़ सकता है। इस जोखिम से बचने के लिए ‘इन-ऑर्बिट इंश्योरेंस’ (In-Orbit Insurance) अलग से लेना पड़ता है। संक्षेप में कहें तो, लॉन्च से लेकर कक्षा में स्थापित होने तक हर स्टेज के लिए बीमा की शर्तें और कवरेज अलग-अलग होते हैं।
क्यों कम कंपनियां उठाती हैं अंतरिक्ष का जोखिम?
अंतरिक्ष क्षेत्र में बीमा देना जोखिम भरा काम है, इसलिए दुनिया की गिनी-चुनी कंपनियां ही इस क्षेत्र में कदम रखती हैं। लगातार मिशन फेल होने की घटनाओं ने बीमा कंपनियों पर भारी आर्थिक दबाव डाल दिया है। द फेडरल की एक रिपोर्ट के अनुसार, अकेले साल 2023 में स्पेस सेक्टर में लगभग 1 बिलियन डॉलर के बीमा क्लेम किए गए। यही कारण है कि स्पेस एजेंसियां केवल उन्हीं बड़े सैटेलाइट्स का बीमा कराती हैं जिनकी कीमत अरबों में होती है, जबकि छोटे सैटेलाइट्स का जोखिम अक्सर ऑपरेटर खुद ही उठाते हैं क्योंकि उनका प्रीमियम काफी महंगा हो सकता है।









