Tags

अमेरिका के ‘टैरिफ वार’ से बेअसर भारतीय दवाएं! जेनेरिक एक्सपोर्ट ने दुनिया में गाड़े झंडे, जानें क्या है वजह

अमेरिका ने पेटेंटेड दवाओं पर 100% टैरिफ लगा दिया है, लेकिन भारत की जेनेरिक दवा निर्यात पर इसका तत्काल बड़ा असर नहीं दिख रहा। GTRI के अनुसार, अमेरिका में 90% से ज्यादा प्रिस्क्रिप्शन जेनेरिक हैं और फिलहाल टैरिफ से मुक्त हैं। हालांकि, भविष्य में शुल्क जेनेरिक पर बढ़ा तो भारतीय फार्मा के लिए अनिश्चितता गहरा सकती है।

By Pinki Negi

अमेरिका के 'टैरिफ वार' से बेअसर भारतीय दवाएं! जेनेरिक एक्सपोर्ट ने दुनिया में गाड़े झंडे, जानें क्या है वजह

अमेरिका और भारत के बीच शुरू हुई नई ‘टैरिफ वार’ में एक चौंकाने वाली तस्वीर उभरकर सामने आई है: पेटेंटेड दवाओं पर 100 फीसदी तक आयात शुल्क लगाने के ताजा फैसले के बावजूद भारत के जेनेरिक दवा निर्यात पर तत्काल बड़ा खतरा नहीं दिख रहा। वजह साफ है- भारत की फार्मा ताकत पेटेंटेड या ब्रांडेड दवाओं से ज्यादा कम लागत वाली जेनेरिक मेडिसिन में है, और अभी तक यह पूरी कैटेगरी टैरिफ के दायरे से बाहर रखी गई है।

ट्रंप का आदेश: राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर कड़ा कदम

2 अप्रैल को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर कर चुनिंदा पेटेंटेड दवाओं और उनसे जुड़ी सक्रिय औषधीय सामग्रियों (API) पर 100 प्रतिशत तक आयात शुल्क लगाने की घोषणा की। व्हाइट हाउस के मुताबिक यह फैसला अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा, सप्लाई चेन पर निर्भरता घटाने और घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने के नाम पर लिया गया है।

इस आदेश के तहत जिन कंपनियों ने अमेरिका में उत्पादन इकाइयां लगाने और दवाओं की कीमतें घटाने जैसे ‘फेवर्ड नेशन’ समझौते किए हैं, उन्हें टैरिफ से राहत या न्यूनतम शुल्क का फायदा मिलेगा, जबकि बाकी कंपनियों के लिए अगले चार साल में शुल्क धीरे-धीरे बढ़कर 100 फीसदी तक जा सकता है।

जेनेरिक दवाओं पर फिलहाल राहत

भारत के लिहाज से सबसे बड़ी राहत यह है कि यह टैरिफ सीधे तौर पर जेनेरिक दवाओं पर लागू नहीं किया गया है। ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका में जितनी दवाएं खपत होती हैं, उनमें से 90 फीसदी से अधिक प्रिस्क्रिप्शन जेनेरिक होती हैं, लेकिन इन पर फिलहाल कोई अतिरिक्त सीमा शुल्क नहीं लगाया गया है। भारत इस सेगमेंट में एक तरह से दुनिया की ‘फार्मेसी’ बन चुका है और अमेरिका के जेनेरिक बाजार में उसकी हिस्सेदारी बेहद मजबूत है।

वर्ष 2025 में भारत ने अमेरिका को करीब 9.7 अरब डॉलर की दवाएं निर्यात कीं, जो उसके कुल 25.8 अरब डॉलर के वैश्विक औषधि निर्यात का लगभग 38 फीसदी हिस्सा है। इनमें 90–95 फीसदी तक शिपमेंट जेनेरिक दवाओं के ही माने जाते हैं, जबकि पेटेंटेड या ब्रांडेड उत्पादों की हिस्सेदारी बहुत सीमित है।

GTRI का आकलन: भारत ‘काफी हद तक सुरक्षित’

इसी वजह से GTRI ने आकलन किया है कि ट्रंप प्रशासन की इस आक्रामक टैरिफ नीति से भारत ‘काफी हद तक सुरक्षित’ रह सकता है। संस्थान के संस्थापक अजय श्रीवास्तव का कहना है कि असली दबाव उन भारतीय कंपनियों पर आ सकता है जो उच्च मूल्य वाली ब्रांडेड या विशेष उपयोग वाली दवाएं बनाती हैं और खास तौर पर वे फर्में जो पेटेंटेड दवाओं के लिए कच्चे माल या इंटरमीडिएट्स सप्लाई करती हैं। इन पर 100 फीसदी शुल्क की मार पड़ने से उनकी लागत बढ़ेगी, मार्जिन घटेगा और अमेरिकी बाजार में प्रतिस्पर्धा कमजोर हो सकती है।

यूरोप और जापान पर सीधी चोट

टैरिफ की मार फिलहाल यूरोप और विकसित देशों पर ज्यादा पड़ने की आशंका है। GTRI के अनुसार, आयरलैंड, जर्मनी, स्विट्जरलैंड, बेल्जियम, डेनमार्क, ब्रिटेन और जापान जैसे देश अमेरिका को पेटेंट और हाई वैल्यू मेडिसिन के प्रमुख निर्यातक हैं, जिनके लिए यह 100 फीसदी शुल्क सीधी चोट साबित हो सकता है। इन देशों की बड़ी मल्टीनेशनल फार्मा कंपनियां बायोलॉजिक्स, कैंसर, ऑटोइम्यून और रेयर डिजीज जैसी महंगी दवाओं का बड़ा हिस्सा अमेरिकी बाजार में बेचती हैं, और अब उन्हें या तो प्राइसिंग समझौते स्वीकार करने होंगे या भारी टैरिफ का सामना करना होगा।

भारत के लिए दोहरे जोखिम

फिर भी तस्वीर पूरी तरह जोखिम-मुक्त नहीं है। पहला खतरा यह है कि अगर भविष्य में अमेरिकी प्रशासन टैरिफ का दायरा जेनेरिक दवाओं तक बढ़ाने का फैसला करता है, तो भारत जैसे देशों के लिए अनिश्चितता काफी बढ़ जाएगी। भारत की कई प्रमुख कंपनियों- जैसे डॉ. रेड्डीज, ऑरोबिंदो, ग्लैंड फार्मा आदि- की कुल आय का 40–50 फीसदी हिस्सा अकेले अमेरिकी बाजार से आता है, इसलिए किसी भी नीति बदलाव का सीधा असर उन पर पड़ेगा।

दूसरा जोखिम यह है कि पेटेंटेड दवाओं के लिए कच्चा माल या कॉन्ट्रैक्ट मैन्युफैक्चरिंग करने वाली भारतीय यूनिट्स पर अगर लंबे समय तक ऊंचा शुल्क लगा रहा, तो वे धीरे-धीरे प्रोडक्शन शिफ्ट या प्राइसिंग प्रेशर के लिए मजबूर हो सकती हैं।

मौका भी, चुनौती भी

विशेषज्ञ मानते हैं कि फिलहाल यह फैसला भारत के लिए ‘विंडो ऑफ अपॉर्च्युनिटी’ भी खोलता है। जैसे-जैसे यूरोपीय और जापानी कंपनियों की पेटेंटेड दवाएं महंगी होंगी, अमेरिकी हेल्थ सिस्टम और इंश्योरर्स की नजर और ज्यादा सस्ती जेनेरिक विकल्पों की तरफ जा सकती है, जहां भारत की पकड़ पहले से मजबूत है। यदि भारत रेगुलेटरी कंप्लायंस, क्वालिटी और सप्लाई स्थिरता पर भरोसा बढ़ाने में सफल रहा, तो वह जेनेरिक सेगमेंट में अपना झंडा और ऊंचा गाड़ सकता है, जबकि पेटेंटेड स्पेस में चुनौतियों के बावजूद खुद को ‘विश्वसनीय पार्टनर’ के रूप में पेश कर सकता है।

कुल मिलाकर, अमेरिकी टैरिफ वार का पहला राउंड भारत के जेनेरिक निर्यात पर भारी नहीं पड़ा है, लेकिन आने वाले वर्षों में नीति का रुख किस तरफ जाता है, यह भारतीय फार्मा उद्योग के लिए निर्णायक साबित होगा।

Author
Pinki Negi
GyanOK में पिंकी नेगी बतौर न्यूज एडिटर कार्यरत हैं। पत्रकारिता में उन्हें 7 वर्षों से भी ज़्यादा का अनुभव है। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत साल 2018 में NVSHQ से की थी, जहाँ उन्होंने शुरुआत में एजुकेशन डेस्क संभाला। इस दौरान पत्रकारिता के क्षेत्र में नए-नए अनुभव लेने के बाद अमर उजाला में अपनी सेवाएं दी। बाद में, वे नेशनल ब्यूरो से जुड़ गईं और संसद से लेकर राजनीति और डिफेंस जैसे कई महत्वपूर्ण विषयों पर रिपोर्टिंग की। पिंकी नेगी ने साल 2024 में GyanOK जॉइन किया और तब से GyanOK टीम का हिस्सा हैं।

अभी-अभी मोदी का ऐलान

हमारे Whatsaap ग्रुप से जुड़ें