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आखिर रविवार को ही क्यों मिलती है छुट्टी? अंग्रेज या भारतीय—किसकी जिद पर शुरू हुआ था वीकऑफ; जानें ये रोचक कहानी

क्या रविवार की छुट्टी सिर्फ अंग्रेजों की देन है या इसके पीछे छिपा है भारतीय मजदूरों का सात साल लंबा संघर्ष? रोमन सम्राट से लेकर मुंबई की मिलों तक, 'संडे' के अवकाश बनने की यह अनकही कहानी आपको हैरान कर देगी।

By Pinki Negi

आखिर रविवार को ही क्यों मिलती है छुट्टी? अंग्रेज या भारतीय—किसकी जिद पर शुरू हुआ था वीकऑफ; जानें ये रोचक कहानी
आखिर रविवार को ही क्यों मिलती है छुट्टी?

रविवार का दिन हम सभी के लिए सुकून और परिवार के साथ बिताने का समय होता है, लेकिन भारत में यह छुट्टी हमेशा से नहीं थी। रविवार को साप्ताहिक अवकाश के रूप में चुनने के पीछे ब्रिटिश शासन और मजदूरों के संघर्ष की एक बड़ी कहानी छिपी है। दरअसल, भारत में मजदूरों को हफ्ते के सातों दिन काम करना पड़ता था, जिसके खिलाफ नारायण मेघाजी लोखंडे ने लंबी लड़ाई लड़ी। उन्हीं के प्रयासों और मजदूरों के अधिकारों की रक्षा के लिए अंततः रविवार को आधिकारिक छुट्टी का दिन घोषित किया गया।

मजदूरों के नायक नारायण मेघाजी लोखंडे

आज हम जिस ‘संडे’ का इंतजार बेसब्री से करते हैं, वह कभी एक सपना हुआ करता था। ब्रिटिश काल के दौरान, विशेषकर मुंबई की कपड़ा मिलों में, मजदूरों की हालत बहुत खराब थी; उन्हें बिना किसी साप्ताहिक अवकाश के हफ्ते के सातों दिन कड़ी मेहनत करनी पड़ती थी। लगातार काम के बोझ ने मजदूरों के स्वास्थ्य को पूरी तरह बिगाड़ दिया था। इसी कठिन दौर में नारायण मेघाजी लोखंडे एक मसीहा बनकर उभरे। उन्होंने मजदूरों की इस दयनीय स्थिति को समझा और उनके हक के लिए ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ आवाज उठानी शुरू की।

7 साल का लंबा संघर्ष और 10 जून 1890 की वह जीत

नारायण मेघाजी लोखंडे ने मजदूरों के दर्द को अपनी आवाज दी और 1881 से 1884 के बीच ब्रिटिश प्रशासन के खिलाफ एक बड़ा आंदोलन छेड़ा। यह कोई मामूली विरोध नहीं था; हजारों मजदूर लोखंडे के नेतृत्व में एकजुट हुए और अपनी मांगों पर अड़े रहे। यह संघर्ष पूरे सात साल तक चला, जिसमें कई बाधाएं आईं। आखिरकार, मजदूरों की अटूट एकजुटता के सामने ब्रिटिश सरकार को घुटने टेकने पड़े। 10 जून 1890 वह ऐतिहासिक दिन था, जब भारत में पहली बार रविवार को आधिकारिक साप्ताहिक छुट्टी के रूप में घोषित किया गया। यह जीत केवल एक दिन के आराम की नहीं, बल्कि मजदूरों के सम्मान और अधिकारों की जीत थी।

छुट्टी के लिए रविवार ही क्यों चुना ?

साप्ताहिक छुट्टी के लिए रविवार को चुनने के पीछे धार्मिक और व्यावहारिक दोनों ही मजबूत कारण थे। उस समय भारत पर ब्रिटिश शासन था और ईसाई धर्म में रविवार को ‘ईश्वर का दिन’ माना जाता है, जो चर्च जाने और प्रार्थना के लिए समर्पित होता है। इसी परंपरा को देखते हुए अंग्रेजों ने रविवार को चुना।

दूसरी ओर, भारतीय पक्ष की बात करें तो नारायण मेघाजी लोखंडे ने तर्क दिया कि हिंदू धर्म में रविवार सूर्य देव का दिन है और कई क्षेत्रों में यह भगवान खंडोबा को समर्पित है। उनका मानना था कि जिस तरह अंग्रेज अपनी प्रार्थना के लिए छुट्टी लेते हैं, वैसे ही भारतीय मजदूरों को भी अपने ईष्ट की पूजा और शरीर को आराम देने के लिए एक दिन का अवकाश मिलना चाहिए।

रविवार की छुट्टी का वैश्विक इतिहास

शायद आपको जानकर हैरानी हो कि रविवार को आराम का दिन बनाने की परंपरा भारत से नहीं, बल्कि सदियों पुराने रोमन साम्राज्य से शुरू हुई थी। साल 321 ईस्वी में रोमन सम्राट कॉन्स्टेंटाइन द ग्रेट ने आधिकारिक तौर पर रविवार को पूरे साम्राज्य में ‘आराम का दिन’ घोषित किया था।

धीरे-धीरे यह परंपरा पूरे यूरोप में फैल गई और ईसाई धर्म की मान्यताओं के साथ जुड़कर ब्रिटेन के प्रशासनिक तंत्र का अटूट हिस्सा बन गई। जब अंग्रेज भारत आए, तो वे अपनी इसी व्यवस्था को यहाँ लेकर आए, जिसे बाद में भारतीय मजदूर आंदोलनों ने अपने अधिकारों के रूप में मजबूती से लागू करवाया।

Author
Pinki Negi
GyanOK में पिंकी नेगी बतौर न्यूज एडिटर कार्यरत हैं। पत्रकारिता में उन्हें 7 वर्षों से भी ज़्यादा का अनुभव है। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत साल 2018 में NVSHQ से की थी, जहाँ उन्होंने शुरुआत में एजुकेशन डेस्क संभाला। इस दौरान पत्रकारिता के क्षेत्र में नए-नए अनुभव लेने के बाद अमर उजाला में अपनी सेवाएं दी। बाद में, वे नेशनल ब्यूरो से जुड़ गईं और संसद से लेकर राजनीति और डिफेंस जैसे कई महत्वपूर्ण विषयों पर रिपोर्टिंग की। पिंकी नेगी ने साल 2024 में GyanOK जॉइन किया और तब से GyanOK टीम का हिस्सा हैं।

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