
अगर आपके बच्चे से साल शुरू होते ही प्राइवेट स्कूलों की ओर से अचानक ज़्यादा फीस वसूल ली जा रही है, तो अब चिंता की ज़गह यह ज़्यादा ताकतवर हुआ है कि अभिभावक खुद ही सीधे सरकार या जिला शुल्क नियामक समिति के सामने मसला उठा सकते हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, नोएडा और कई दूसरे राज्यों में प्राइवेट स्कूलों की फीस मनमानी पर लगाम लगाने के लिए नए नियम और सख्ती के साथ शिकायत सिस्टम शुरू किए जा चुके हैं।
नोएडा में 7.23% से ज्यादा फीस बढ़ोतरी “गैर‑कानूनी”
नोएडा की जिला मजिस्ट्रेट मेधा रूपम की ओर से हाल ही में जारी निर्देश ने तो यह साफ‑साफ बता दिया कि अब प्राइवेट स्कूल जितनी चाहें उतनी फीस नहीं बढ़ा सकते। जिला शुल्क नियामक समिति की बैठक में तय हुआ है कि स्कूलों की फीस में अधिकतम 7.23% तक ही वृद्धि की जा सकती है, जो असल में कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) प्लस 5 प्रतिशत के गणित पर आधारित है।
यह व्यवस्था उत्तर प्रदेश स्ववित्तपोषित स्वतंत्र विद्यालय (शुल्क विनियमन) अधिनियम, 2018 के तहत लागू की गई है। अगर कोई स्कूल नियमों को दरकिनार करके 7.23% से ज़्यादा फीस बढ़ाता है, तो अभिभावक जिला शुल्क नियामक समिति को सीधे शिकायत भेजकर उसके खिलाफ कार्रवाई की मांग कर सकते हैं।
फीस संरचना अब पारदर्शी और दर्ज होनी अनिवार्य
मीडिया रिपोर्ट्स ने जानकारी जुटाई है कि अब इस सेशन में नियमों के अनुसार, फीस की पूरी बनावट- प्रति कक्षा, शुल्क के प्रकार, इन्फ्रास्ट्रक्चर चार्ज, अन्य अतिरिक्त शुल्क- स्कूलों को जिला शुल्क नियामक समिति को देनी होती है और यह जानकारी स्कूल की वेबसाइट या नोटिस बोर्ड पर भी रखी जानी अनिवार्य है। इसका मकसद यह है कि अभिभावक को फीस की वास्तविक गणना समझ आए, न कि बस एक धन राशि देखकर चुप हो जाए।
किताबों-यूनिफॉर्म पर भी ज़ोर‑जबरदस्ती पर रोक
नोएडा में जो निर्देश जारी हुए हैं, उसमें केवल फीस की वृद्धि ही नहीं, बल्कि किताबों, यूनिफॉर्म और स्टेशनरी पर भी सख्त नियंत्रण लगाया गया है। स्कूलों से साफ‑साफ कहा गया है कि वे एनसीईआरटी की किताबों को प्राथमिकता दें, और अभिभावकों को किसी विशेष दुकान या कैंटीन से किताब, यूनिफॉर्म या अन्य सामान खरीदने के लिए बाध्य नहीं कर सकते। नियमों के अनुसार, एक ही तरह की यूनिफॉर्म पांच साल तक बदली नहीं जा सकती, और किताबों को निर्मूल रूप से बदलने पर भी रोक लगाई गई है, ताकि परिवार पर लगातार नए खर्च का बोझ न थोपा जा सके।
जुर्माना और मान्यता रद्द करने तक जा सकती है नौबत
ऐसे में अगर कोई स्कूल नियमों का उल्लंघन करता है तो उस पर 1 लाख से लेकर 5 लाख रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। बार‑बार नियम तोड़ने वाले संस्थानों के खिलाफ यह जुर्माना और भी कड़ा हो सकता है, और उनकी मान्यता रद्द या अन्य दंडात्मक कार्रवाई की जा सकती है। Zee News के स्रोत बताते हैं कि शिकायतें ऑनलाइन भी आसानी से की जा सकती हैं; नोएडा जिले के लिए जिला शुल्क नियामक समिति की ऑफिशियल ईमेल‑आईडी feecommitteegbn@gmail.com के जरिए अभिभावक अपनी शिकायत ई‑मेल कर सकते हैं, जिस पर विभाग रिकॉर्ड में संज्ञान लेता है।
दिल्ली में भी समान रुख
दिल्ली सरकार ने भी इसी कड़ी में निजी स्कूलों की फीस पर नया नियामक कानून लागू कर दिया है, जिसके बाद स्कूल बिना सरकारी मंज़ूरी और पूरी पारदर्शिता के फीस नहीं बढ़ा सकते। दिल्ली सरकार ने यह भी घोषणा की है कि स्कूल अपने कैंपस या घर‑घर आधारित दुकानों की किताबें और यूनिफॉर्म खरीदने के लिए अभिभावकों पर ज़बरदस्ती नहीं कर सकते- यह नियम उत्तर प्रदेश और नोएडा में भी लगभग उसी भावना से लागू हो रहा है।
आम परिवार को भी मिली राहत
जानकार बताते हैं कि इन नियमों के पीछे सरकार का मुख्य लक्ष्य यह है कि अच्छी शिक्षा को अमीरों के लिए निजी सामान न बनाया जा सके, बल्कि आम परिवार भी निजी स्कूलों के दरवाज़े पर आर्थिक रूप से दबाव झेले बिना बच्चों को नाम दे सके। अभिभावकों के लिए यह खुलासा काफी हद तक अच्छी खबर है, लेकिन वहीं यह भी ज़रूरी है कि वे अपनी शिकायतें दस्तावेज़- पुरानी रसीद, फीस स्ट्रक्चर, नोटिस आदि के साथ दर्ज करें, ताकि शिकायतें जल्द और प्रभावी तरीके से विचाराधीन हो सकें।
नतीजतन, अगले कुछ साल तक प्राइवेट स्कूलों की फीस मनमानी का अध्याय अभिभावकों के अधिकार और सरकारी निगरानी के दबाव में काफी हद तक बदलता दिखाई दे सकता है।









