
कामकाजी महिलाओं के लिए सुप्रीम कोर्ट से लगातार खुशखबरी आ रही है। पहले मातृत्व अवकाश को मौलिक अधिकार घोषित किया, तो अब गोद लेने वाली माताओं को भी तीन महीने की उम्र सीमा से आजादी मिली। शीर्ष अदालत ने सामाजिक सुरक्षा संहिता 2020 की धारा 60(4) को असंवैधानिक ठहराते हुए कहा कि गोद लेने वाली मां को बच्चे की उम्र की परवाह किए बिना 12 सप्ताह का मातृत्व अवकाश मिलेगा। जस्टिस जेबी पार्दीवाला और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने स्पष्ट किया कि बच्चे सौंपे जाने की तारीख से लाभ शुरू होगा।
यह फैसला तमिलनाडु की शिक्षिका के. उमादेवी के पिछले मामले से जुड़ा है, जहां कोर्ट ने मई 2025 में ‘दो जीवित बच्चों’ नियम को उदार बनाया था। उमादेवी को तीसरे बच्चे पर अवकाश से वंचित किया गया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे पलट दिया। अब नया फैसला गोद लेने वाली माताओं के लिए मील का पत्थर साबित हो रहा है। पहले नियम में केवल तीन महीने से कम उम्र के बच्चे पर 12 सप्ताह का प्रावधान था, जिसे कोर्ट ने भेदभावपूर्ण बताकर रद्द कर दिया। कोर्ट ने पितृत्व अवकाश पर सरकार को फैसला लेने की छूट दी है।
फैसले का पूरा मामला
यह याचिका गोद लेने वाली माताओं के अधिकारों को लेकर दायर हुई थी। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि संहिता का प्रावधान जैविक माताओं के 26 सप्ताह के लाभ से कमतर है। बेंच ने सहमति जताते हुए कहा, “परिवार की परिभाषा केवल जैविक संबंधों तक सीमित नहीं। गोद लेना परिवार विस्तार का वैध तरीका है।” जजों ने भावुक अपील की कि गोद लिए बच्चे के साथ माता-पिता का भावनात्मक जुड़ाव जैविक बच्चे जितना गहरा होता है। बच्चे की उम्र इस अधिकार को सीमित नहीं कर सकती। कोर्ट ने अनुच्छेद 14 (समानता), 15 (लिंग भेदभाव निषेध) और 21 (जीवन-गरिमा) का हवाला देकर फैसला सुनाया।
पिछले फैसले में जस्टिस अभय एस ओका और उज्जल भुइयां ने मातृत्व अवकाश को ‘प्रजनन अधिकारों’ का हिस्सा बताया था। वहां तमिलनाडु सरकार के ‘दो बच्चे’ नियम को केंद्रीय मातृत्व लाभ अधिनियम 1961 के विरुद्ध पाया गया। उमादेवी को 8 अगस्त 2025 से 7 अगस्त 2026 तक पूर्ण लाभ का आदेश दिया गया। अब यह नया निर्णय निजी-सार्वजनिक क्षेत्र की सभी महिलाओं पर लागू होगा।
कामकाजी महिलाओं पर प्रभाव
यह दोहरा फैसला महिलाओं की कार्यबल भागीदारी को मजबूत करेगा। भारत में 48% महिलाएं प्रसव के बाद नौकरी छोड़ देती हैं। मातृत्व अवकाश बढ़ने से यह आंकड़ा कम होगा। गोद लेने वाली मांएं, जो अक्सर 30-40% कम अवकाश पाती थीं, अब समान लाभ लेंगी। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे सरकारी योजनाएं जैसे बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ को बल मिलेगा। हालांकि, पितृत्व अवकाश पर अस्पष्टता बनी हुई है। कोर्ट ने कहा कि सरकार नीति बनाए, लेकिन समयसीमा नहीं दी।
कानूनी और सामाजिक चुनौतियां
मातृत्व लाभ अधिनियम 2017 ने 26 सप्ताह का प्रावधान किया, लेकिन राज्य नियम अक्सर बाधा बनते हैं। नया फैसला राज्यों को नियम समीक्षा के लिए बाध्य करेगा। महिला आयोग ने स्वागत किया है, लेकिन कार्यान्वयन पर नजर रखने की बात कही। निजी कंपनियां, जहां 50% कर्मचारी महिलाएं हैं, को अब अनुपालन करना पड़ेगा। गोद लेने की प्रक्रिया में भावनात्मक तनाव को देखते हुए यह अवकाश मानसिक स्वास्थ्य के लिए जरूरी है।
कामकाजी महिलाओं ने सोशल मीडिया पर इसे ‘मातृत्व क्रांति’ करार दिया। एक वकील ने कहा, “अब मां बनना नौकरी की बाधा नहीं।” सुप्रीम कोर्ट के ये फैसले लिंग समानता की दिशा में ऐतिहासिक हैं। सरकार को जल्द पितृत्व नीति लानी चाहिए ताकि परिवार संतुलित बने।









