
क्या सरकारी कर्मचारी की मृत्यु के बाद उसकी लिव-इन पार्टनर पेंशन की हकदार हो सकती है? यह सवाल दिल्ली हाईकोर्ट में आई एक याचिका के बाद चर्चा का विषय बन गया है। मामला एक ऐसे कर्मचारी का है जो पत्नी के छोड़कर चले जाने के बाद 1983 से दूसरी महिला के साथ रह रहा था, जिसके कारण उसे विभागीय कार्रवाई और वेतन कटौती का सामना भी करना पड़ा। अब हाईकोर्ट ने इस मुद्दे पर केंद्र सरकार को विचार करने का निर्देश दिया है। हालांकि, लिव-इन पार्टनर को पेंशन का लाभ मिलेगा या नहीं, इस पर अंतिम फैसला पूरी तरह से केंद्र सरकार के नियमों और उनकी मंजूरी पर निर्भर करता है।
दिल्ली हाईकोर्ट का केंद्र को विचार करने का आदेश
एक सरकारी कर्मचारी ने दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर कर अपनी लिव-इन पार्टनर और बच्चों को फैमिली पेंशन और स्वास्थ्य सुविधाओं का लाभ दिलाने की मांग की है। इससे पहले, रिटायरमेंट के समय याचिकाकर्ता पर गलत जानकारी देने के आरोप में पेंशन और ग्रेच्युटी का 50% हिस्सा रोकने की सजा सुनाई गई थी।
मामला पेचीदा इसलिए है क्योंकि कर्मचारी अपनी लिव-इन पार्टनर को कानूनी रूप से पेंशन रिकॉर्ड (PPO) में दर्ज कराना चाहता है। अब दिल्ली हाईकोर्ट ने मानवीय आधार और बदलते सामाजिक परिवेश को देखते हुए केंद्र सरकार को इस विशेष मामले पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करने का निर्देश दिया है।
पेंशन लाभ रोकना गलत, CAT का पुराना आदेश रद्द
दिल्ली हाईकोर्ट की बेंच ने इस मामले में कर्मचारी के पक्ष में महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। जस्टिस नवीन चावला और मधु जैन की बेंच ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता ने कभी भी अपने लिव-इन रिश्ते को नहीं छिपाया था। कोर्ट ने माना कि सिर्फ इसलिए पेंशन और ग्रेच्युटी का 50% हिस्सा रोकना गलत है कि कर्मचारी ने अपने पार्टनर और बच्चों को परिवार के हिस्से के रूप में दर्ज कराने की कोशिश की।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (CAT) के 2018 के उस फैसले को खारिज कर दिया, जिसने पेंशन कटौती की सजा को सही माना था। कोर्ट के इस रुख से अब कर्मचारी को उसके रुके हुए रिटायरमेंट बेनिफिट्स मिलने का रास्ता साफ होता दिख रहा है।
हाईकोर्ट ने ब्याज सहित पेंशन देने और पार्टनर का नाम जोड़ने का दिया आदेश
दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में साफ किया है कि किसी कर्मचारी की पेंशन और ग्रेच्युटी रोकना पूरी तरह से गलत है। कोर्ट ने सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (CAT) के उस फैसले को पलट दिया जिसने 50% पेंशन रोकने को सही माना था।
जस्टिस ने आदेश दिया कि याचिकाकर्ता को उसकी पूरी रुकी हुई राशि 6% सालाना ब्याज के साथ चुकाई जाए। साथ ही, कोर्ट ने सरकार से कहा है कि वह पेंशन रिकॉर्ड (PPO) में कर्मचारी की लिव-इन पार्टनर और बच्चों का नाम शामिल करने की मांग पर गंभीरता से विचार करे, ताकि उन्हें भविष्य में फैमिली पेंशन और स्वास्थ्य सुविधाओं (CGHS) का लाभ मिल सके।









