
सुप्रीम कोर्ट ने चेक बाउंस (धारा 138, NI Act) के मामलों में अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) को लेकर एक महत्वपूर्ण निर्णय दिया है। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि अब ‘अकाउंट पेयी चेक’ से जुड़े मामलों की सुनवाई वहीं होगी, जहाँ शिकायतकर्ता (पैसे प्राप्त करने वाले) का बैंक खाता (यानी होम ब्रांच) स्थित है। इस फैसले से अब कानूनी बहस समाप्त हो गई है और मामलों की सुनवाई का स्थान स्पष्ट हो गया है।
चेक बाउंस मामले में ‘Per Incuriam’ निर्णय
सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने जय बालाजी इंडस्ट्रीज लिमिटेड के मामले में फैसला सुनाया है। कोर्ट ने अपने ही एक अन्य समान पीठ द्वारा योगेश उपाध्याय बनाम अटलांटा लिमिटेड (2023) मामले में दिए गए पिछले निर्णय को ‘Per Incuriam’ (कानून की अनदेखी पर आधारित) घोषित कर दिया है। कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि पिछला फैसला नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स (NI) एक्ट की धारा 142(2)(a) और उसके स्पष्टीकरण (Explanation) की वैधानिक योजना पर ठीक से विचार करने में विफल रहा था।
चेक बाउंस मामले को ट्रांसफर करने पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला
सुप्रीम कोर्ट एक चेक बाउंस (Check Bounce) की शिकायत को भोपाल की कोर्ट से कोलकाता की कोर्ट में ट्रांसफर करने वाली एक याचिका पर सुनवाई कर रहा था। कोर्ट ने 2015 के नए कानून का विश्लेषण किया, जिसके तहत चेक बाउंस का मामला उसी कोर्ट में दर्ज होता है जहाँ शिकायतकर्ता का बैंक खाता है (इस केस में भोपाल में)।
लेकिन कोर्ट ने 2014 के ‘दशरथ रूपसिंह राठौड़’ मामले के पुराने फैसले का हवाला देते हुए, यह ट्रांसफर मंजूर कर दिया। ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि शिकायत को भोपाल भेजे जाने से पहले ही कोलकाता में गवाही दर्ज करने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी, इसलिए न्याय की सुविधा के लिए इसे कोलकाता भेज दिया गया।
चेक बाउंस का मामला
यह कानूनी विवाद जय बालाजी इंडस्ट्रीज लिमिटेड (आरोपी कंपनी) से जुड़ा है, जिसने मेसर्स एचईजी लिमिटेड (शिकायतकर्ता कंपनी) को लगभग ₹19.94 लाख का एक चेक दिया था। आरोपी कंपनी ने यह चेक स्टेट बैंक ऑफ बीकानेर एंड जयपुर, कोलकाता शाखा से जारी किया, जिसे शिकायतकर्ता ने स्टेट बैंक ऑफ इंडिया, भोपाल शाखा में जमा कराया। दुर्भाग्यवश, खाते में पर्याप्त पैसा न होने के कारण यह चेक बाउंस हो गया।
चेक बाउंस मामले में क्षेत्राधिकार का विवाद
यह मामला तब शुरू हुआ जब शिकायतकर्ता ने 2014 में कोलकाता के एक मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट (MM) के सामने शिकायत दर्ज कराई। कोर्ट ने समन जारी किया, आरोप तय किए और मुख्य गवाही का हलफनामा भी रिकॉर्ड किया। हालांकि, निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट, 2015 में बदलाव आने के बाद, 2016 में MM कोलकाता ने यह कहते हुए शिकायत वापस कर दी कि अब उनके पास इस मामले को सुनने का अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) नहीं है।
इसके बाद शिकायतकर्ता ने इस मामले को भोपाल के JMFC कोर्ट में फाइल किया। इस पर, आरोपियों ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की और यह तर्क दिया कि जब एक बार गवाही रिकॉर्ड होना शुरू हो जाती है, तो ऐसे मामलों को पुरानी (मूल) अदालत में ही जारी रखा जाना चाहिए।









