
भारतीय सेना की गौरवशाली गोरखा रेजिमेंट पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। अग्निपथ योजना के कठोर सेवा नियमों के कारण नेपाल सरकार ने अपने युवाओं को भर्ती रैलियों में भाग लेने से साफ इनकार कर दिया है। पिछले चार वर्षों से नेपाली गोरखाओं की कोई नई भर्ती नहीं हुई, जिससे रेजिमेंट की ताकत धीरे-धीरे कम हो रही है।
विवाद की जड़ें
विवाद की जड़ें गहरी हैं। 1947 में भारत, नेपाल और ब्रिटेन के बीच हुए ऐतिहासिक त्रिपक्षीय समझौते के तहत गोरखा सैनिकों को स्थायी कमीशन, पेंशन और पूर्ण सैन्य सुविधाएं मिलनी थीं। लेकिन अग्निपथ योजना में चार साल की सीमित सेवा और केवल 25 प्रतिशत को नियमित化 का प्रावधान इसे उल्लंघन का रूप देता है। नेपाल सरकार का मानना है कि बाकी 75 प्रतिशत अग्निवीर बिना पेंशन के बेरोजगार लौटेंगे, जो देश में सामाजिक अस्थिरता पैदा कर सकता है।
नेपाल का राजनीतिक रुख
नेपाल में राजनीतिक दल भी इस मुद्दे पर एकजुट हैं। माओवादी केंद्र सहित विपक्षी दल पुरानी भर्ती प्रणाली बहाल करने की मांग कर रहे हैं। पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की सरकार ने अगस्त 2022 से भर्ती पर पूर्ण रोक लगा दी। जून 2022 के बाद बुटवल या धरान जैसी रैलियां रद्द हो गईं। नेपाल के युवा भर्ती के इच्छुक हैं, लेकिन सरकारी अनुमति के अभाव में उनका सपना अधूरा है।
गोरखा रेजिमेंट पर असर
गोरखा रेजिमेंट पर असर गंभीर है। 43 बटालियनों वाली इस रेजिमेंट में करीब 60 प्रतिशत नेपाली सैनिक थे, जो हर साल 1200-1800 की संख्या में भर्ती होते थे। रिटायरमेंट के बावजूद नई भरती न होने से अगले 10 वर्षों में नेपाली गोरखा पूरी तरह खत्म हो सकते हैं। भारतीय सेना अब कुमाऊं, गढ़वाल जैसे भारतीय क्षेत्रों से गोरखा-भाषी युवाओं पर जोर दे रही है, लेकिन यह वैकल्पिक समाधान अपूर्ण है।
भू-रणनीतिक चुनौतियां
इस गतिरोध ने भू-रणनीतिक चिंताएं भी बढ़ाई हैं। चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) ने नेपाली गोरखाओं को लुभाने की कोशिशें शुरू कर दी हैं। ब्रिटिश आर्मी ने भी नई गोरखा रेजिमेंट बनाकर फायदा उठाया। नेपाल में हिंसा के बीच मौजूदा सैनिकों की छुट्टियां बढ़ा दी गईं। भारत ने स्पष्ट किया कि सभी भर्तियां अब अग्निपथ के तहत ही होंगी, पुराने नियमों का कोई रास्ता नहीं।
भविष्य की अनिश्चितता
यह विवाद भारत-नेपाल संबंधों के लिए चुनौती है। गोरखाओं का ‘जय गोरखा’ नारा भारतीय सेना की शान रहा, लेकिन नीतिगत टकराव ने इसे खतरे में डाल दिया। क्या कूटनीतिक बातचीत से रास्ता निकलेगा, या गोरखा रेजिमेंट का स्वरूप हमेशा के लिए बदल जाएगा? समय ही बताएगा।









