
12 फरवरी 2026 को किसान संगठनों और ट्रेड यूनियनों ने सरकार की नीतियों के विरोध में ‘भारत बंद’ का आह्वान किया है। मुख्य रूप से लेबर सुधारों और अन्य सरकारी फैसलों के खिलाफ एकजुट होकर यह हड़ताल की जा रही है। जब भी देश में इस तरह का बड़ा प्रदर्शन होता है, तो अक्सर यह सवाल उठता है कि क्या किसी भी संगठन के पास भारत बंद करने का कानूनी अधिकार है और क्या यह कदम संविधान के दायरे में आता है। भारतीय कानून के नजरिए से भारत बंद की संवैधानिकता को समझना बेहद जरूरी है क्योंकि यह आम नागरिकों के जीवन और उनके अधिकारों पर सीधा असर डालता है।
2 अप्रैल 2018 को बिना किसी सूचना के थम गया था देश
भारत के इतिहास में 2 अप्रैल 2018 का दिन एक ऐतिहासिक ‘भारत बंद’ के रूप में याद किया जाता है। इस बंद की खास बात यह थी कि मीडिया और प्रशासन को इसकी पहले से कोई भनक तक नहीं लगी थी और अचानक ही पूरे देश में प्रदर्शन शुरू हो गए। यह आंदोलन मुख्य रूप से दलित और आदिवासी समुदायों द्वारा किया गया था, जो एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम में सुप्रीम कोर्ट द्वारा किए गए संशोधनों का विरोध कर रहे थे। अपनी नाराजगी जताने के लिए लाखों की संख्या में लोग सड़कों पर उतर आए थे, जिससे यह हाल के वर्षों का सबसे प्रभावशाली और व्यापक बंद बन गया था।
भारत बंद कानून क्या है?
भारत में किसी भी संगठन या समूह को अपनी मांगों को लेकर ‘भारत बंद’ का आह्वान करने का पूरा अधिकार है। हालांकि, यह अधिकार तभी तक वैध है जब तक प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहता है। कानूनी तौर पर, किसी को भी हिंसा, तोड़फोड़ या डराने-धमकाने के जरिए दुकानें और कामकाज बंद कराने की इजाजत नहीं है। यदि कोई संगठन लोगों को जबरदस्ती रोकता है या सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाता है, तो इसे अपराध माना जाता है और कानून के उल्लंघन के आरोप में सख्त कार्रवाई की जा सकती है। आसान शब्दों में कहें तो विरोध करना अधिकार है, लेकिन जबरदस्ती करना गैर-कानूनी है।
भारत बंद का आह्वान
भारत में कोई भी राजनीतिक दल, ट्रेड यूनियन या सामाजिक संगठन अपनी मांगों की ओर ध्यान खींचने के लिए ‘भारत बंद’ की अपील कर सकता है। हालांकि, यह समझना जरूरी है कि यह केवल एक आह्वान या निवेदन होता है, इसे सरकार या अदालत का कोई कानूनी आदेश नहीं माना जा सकता। इसका मतलब यह है कि किसी भी नागरिक या संस्थान के लिए इस अपील को मानना अनिवार्य नहीं है; वे अपनी इच्छा और सुविधा के अनुसार इसे समर्थन देने या न देने का निर्णय ले सकते हैं।
कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए सरकार के कड़े कदम
जब भी किसी प्रदर्शन या बंद के दौरान शांति भंग होने की आशंका होती है, तो सरकार सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए उस इलाके में धारा 144 लागू कर सकती है। इसके तहत एक स्थान पर भीड़ इकट्ठा होने पर पाबंदी लगा दी जाती है और भारी संख्या में पुलिस बल तैनात किया जाता है ताकि स्थिति नियंत्रण में रहे। यदि इस दौरान कोई भी व्यक्ति हिंसा फैलाता है या सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाता है, तो न केवल उस पर कानूनी कार्रवाई की जाती है, बल्कि कानून के अनुसार हुए नुकसान की भरपाई भी उसी दोषी व्यक्ति या संगठन से करवाई जा सकती है।
विरोध का अधिकार और संविधान क्या कहता है आर्टिकल 19?
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19 (1) (C) नागरिकों को संगठन बनाने और शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात रखने की आजादी देता है, जिसके अंतर्गत हड़ताल को एक मौलिक अधिकार के रूप में देखा जाता है। नागरिक बिना किसी हिंसा के अपनी मांगों के लिए हड़ताल या भारत बंद का आह्वान कर सकते हैं क्योंकि लोकतंत्र में विरोध करना एक कीमती अधिकार है। हालांकि, संविधान यह भी स्पष्ट करता है कि किसी भी व्यक्ति को जबरन चक्का जाम करने या दूसरों के अधिकारों को बाधित करने का पूर्ण अधिकार नहीं है। सरल शब्दों में, जब तक हड़ताल शांतिपूर्ण है, वह असंवैधानिक नहीं है, लेकिन दूसरों को मजबूर करना कानून के खिलाफ है।
सुप्रीम कोर्ट के विरोधाभासी फैसले
हड़ताल के अधिकार को लेकर भारतीय न्यायपालिका का नजरिया समय के साथ विकसित हुआ है। जहाँ 1961 में एक व्याख्या के दौरान ट्रेड यूनियनों द्वारा अपनी बात रखने के लिए हड़ताल को अनुच्छेद 19(1)(C) के तहत एक अधिकार के रूप में देखा गया, वहीं ‘अखिल भारतीय बैंक कर्मचारी संघ’ (All India Bank Employees’ Association) के प्रसिद्ध मामले में सुप्रीम कोर्ट ने एक अलग रुख अपनाया।
इस ऐतिहासिक फैसले में कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संगठन बनाने का अधिकार तो मौलिक है, लेकिन हड़ताल करना ‘मौलिक अधिकार’ की श्रेणी में नहीं आता। इसका अर्थ यह है कि विरोध प्रदर्शन करना एक लोकतांत्रिक अधिकार तो है, लेकिन इसे संविधान द्वारा दी गई ऐसी गारंटी नहीं माना जा सकता जिसे किसी भी स्थिति में छीना न जा सके।









