
पंजाब के बरनाला जिले के सेहना गांव के सोहलप्रीत सिंह सिद्धू ने अपनी मेहनत से कामयाबी की नई कहानी लिखी है। जहाँ आज के युवा करियर को लेकर उलझन में रहते हैं या विदेश जाने का सपना देखते हैं, वहीं 18 साल के सोहलप्रीत ने डेयरी फार्मिंग को अपना पेशा बनाया। उनका मानना है कि माता-पिता का पैसा विदेश भेजने में बर्बाद करने के बजाय अपने देश में ही कारोबार में लगाना बेहतर है। 12वीं पास सोहलप्रीत आज अपने डेयरी बिजनेस से हर महीने 5 से 6 लाख रुपये कमा रहे हैं। अब वे वेटरनरी कोर्स करने की तैयारी भी कर रहे हैं ताकि अनुभव के साथ-साथ प्रोफेशनल जानकारी लेकर अपने काम को और बड़ा बना सकें।
15 साल की उम्र में पहली भैंस से शुरू किया सफर
सोहलप्रीत सिंह सिद्धू की कामयाबी की नींव महज 15 साल की उम्र में पड़ गई थी। उन्होंने अपने परिवार को मनाकर अगस्त 2023 में 1.20 लाख रुपये में पहली भैंस खरीदी। छोटे स्तर से शुरू हुए इस शौक को सोहलप्रीत ने अपनी मेहनत से एक बड़े बिजनेस में बदल दिया।
वे डेयरी से होने वाली हर कमाई को नए पशु खरीदने में लगाते रहे। नतीजा यह है कि मात्र तीन साल में उनके पास 120 पशुओं का काफिला खड़ा हो गया है, जिसमें मुर्रा भैंसों से लेकर एचएफ (HF) और साहीवाल गायें शामिल हैं। वर्तमान में 50 से ज्यादा पशु दूध दे रहे हैं, और सोहलप्रीत का अगला लक्ष्य अपनी डेयरी को 550 भैंसों तक ले जाने का है।
हलप्रीत का फॉर्मूला—कम लागत और ज्यादा मुनाफा
सोहलप्रीत की डेयरी आज सफलता की ऊंचाइयों पर है, जहाँ रोजाना 650 से 700 लीटर दूध का उत्पादन हो रहा है। वे अपना दूध बरनाला के एक कलेक्शन सेंटर पर बेचते हैं, जिससे उनकी मासिक सेल लगभग 10 लाख रुपये तक पहुँच जाती है। खास बात यह है कि इस कमाई का करीब 60 फीसदी हिस्सा सीधे मुनाफे के तौर पर बचता है।
सोहलप्रीत अपनी लागत कम करने के लिए पशुओं का चारा खुद की जमीन पर उगाते हैं और पशुओं की सेहत का इतना ख्याल रखते हैं कि दवाइयों पर खर्च न के बराबर होता है। इस मुनाफे को वे ऐश-ओ-आराम के बजाय दोबारा नए पशु खरीदने और डेयरी के विस्तार में लगा रहे हैं।
आधुनिक सुविधाओं और वैज्ञानिक तकनीक से लैस सोहलप्रीत की डेयरी
सोहलप्रीत का डेयरी फार्म केवल मेहनत ही नहीं, बल्कि एक बेहतर मैनेजमेंट का भी नतीजा है। उनके पास अपनी 20 एकड़ जमीन के साथ-साथ 22 एकड़ जमीन लीज पर है, यानी कुल 42 एकड़ का विशाल कृषि क्षेत्र। डेयरी फार्म एक एकड़ में फैला है, जहाँ पशुओं के लिए अलग फीडिंग एरिया, हवादार शेड और भैंसों के नहाने के लिए आधुनिक पानी के कुंड बनाए गए हैं।
खेती और डेयरी का ऐसा तालमेल बिठाया गया है कि करीब 4.5 एकड़ जमीन में सिर्फ पशुओं का चारा उगाया जाता है। घर पर ही तैयार होने वाले साइलेज (पशुओं का अचार) और मक्का, जौ व बाजरा जैसी फसलों के कारण पशुओं को भरपूर पोषण मिलता है और बाहर से चारा खरीदने का भारी खर्च बच जाता है।
सोहलप्रीत ने बताया सफलता का कड़वा सच
सोहलप्रीत की यह कामयाबी केवल मुनाफे की कहानी नहीं है, बल्कि इसमें असफलताओं से मिली सीख भी शामिल है। शुरुआत में परिवार को उनके जुनून पर संदेह था, लेकिन आज पिता बलबीर सिंह और दादा निशान सिंह को अपने बेटे पर गर्व है। सोहलप्रीत स्वीकार करते हैं कि शुरू में जानकारी की कमी के कारण उन्होंने कुछ गलत नस्ल की भैंसें खरीद ली थीं, जिससे उन्हें आर्थिक नुकसान भी हुआ।
हालांकि, उन्होंने हार नहीं मानी और हर बारीकी को खुद सीखा। उनका मानना है कि जब तक आप गोबर उठाने से लेकर दूध निकालने तक का काम खुद नहीं समझते, तब तक आप सफल नहीं हो सकते। सोहलप्रीत के लिए डेयरी कोई मजबूरी नहीं बल्कि उनका शौक है, और वे पंजाब में रहकर ही अपने भविष्य को और सुनहरा बनाना चाहते हैं।









