
आज के दौर में निवेश के ढेरों विकल्पों के बावजूद SIP (Systematic Investment Plan) लोगों की पहली पसंद बनी हुई है। इसकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि आपको एक साथ बहुत सारे पैसे लगाने की जरूरत नहीं होती; आप अपनी सुविधा के अनुसार छोटी रकम से भी शुरुआत कर सकते हैं।
नौकरीपेशा और नए निवेशकों के लिए यह एक ‘ऑटोमैटिक’ गुल्लक की तरह है, जो न केवल निवेश में अनुशासन लाती है बल्कि लंबे समय में कंपाउंडिंग की ताकत से एक बड़ा फंड खड़ा कर देती है। अक्सर लोग सोचते हैं कि क्या मात्र ₹1000 महीना बचाकर भी लखपति बना जा सकता है? तो जवाब है—हाँ! सही समय और सही फंड के चुनाव के साथ यह गणित बिल्कुल संभव है।
क्यों SIP में निवेश की ‘रकम’ से ज्यादा ‘समय’ की कीमत है?
अक्सर छोटे निवेशकों को लगता है कि हर महीने महज ₹1000 बचाकर अमीर नहीं बना जा सकता, लेकिन SIP का असली गणित कंपाउंडिंग (चक्रवृद्धि ब्याज) में छिपा है। निवेश के शुरुआती सालों में मुनाफा भले ही कम दिखे, लेकिन असली खेल तब शुरू होता है जब आपके रिटर्न पर भी रिटर्न मिलना शुरू हो जाता है। इसे ही ‘कंपाउंडिंग का जादू’ कहते हैं।
SIP की सबसे बड़ी सीख यही है कि “जल्दी शुरुआत करना, ज्यादा रकम लगाने से कहीं बेहतर है।” आप जितना लंबा समय बाजार को देंगे, आपके पैसे की रफ्तार उतनी ही तेज होती जाएगी। समय ही वह खाद है जो आपके निवेश के छोटे से बीज को एक विशाल बरगद के पेड़ में बदल देता है।
21 साल का धैर्य और 11 लाख का बड़ा फंड
SIP का गणित स्पष्ट करता है कि अमीर बनने के लिए बड़ी रकम नहीं, बल्कि अनुशासन की जरूरत है। अगर आप हर महीने मात्र ₹1000 का निवेश करते हैं और आपको 12% का औसत रिटर्न मिलता है, तो परिणाम चौंकाने वाले हो सकते हैं:
- 21 साल का जादू: आप कुल ₹2.52 लाख जमा करेंगे, लेकिन मैच्योरिटी पर आपको लगभग ₹11.39 लाख मिलेंगे। यानी करीब ₹8.87 लाख केवल मुनाफे के तौर पर मिलेंगे।
- पहला पड़ाव (1 लाख): यदि आपका लक्ष्य सिर्फ 1 लाख रुपये जोड़ना है, तो यह केवल 6 साल में संभव है। इसमें आप खुद करीब ₹72,000 निवेश करेंगे और बाकी का पैसा रिटर्न से बनेगा।
यह आंकड़े साबित करते हैं कि निवेश में असली ताकत आपके द्वारा बचाए गए पैसों की नहीं, बल्कि उस समय की है जो आप बाजार को देते हैं।
जानें क्यों ‘मंदी’ ही है SIP निवेशकों के लिए असली लॉटरी
शेयर बाजार में गिरावट आते ही अक्सर SIP निवेशक घबराकर अपना निवेश रोकने की गलती कर बैठते हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि गिरता हुआ बाजार आपके लिए “डिस्काउंट सेल” की तरह होता है। जब बाजार नीचे जाता है, तो आपकी उसी ₹1000 की किस्त में म्यूचुअल फंड की ज्यादा यूनिट्स खरीदी जाती हैं।
इसे ‘रुपी कॉस्ट एवरेजिंग’ (Rupee Cost Averaging) कहते हैं। जब बाजार वापस संभलता है, तो यही अतिरिक्त यूनिट्स आपके पोर्टफोलियो की वैल्यू को रॉकेट की तरह ऊपर ले जाती हैं। इसलिए, मंदी के समय SIP बंद करना खुद का नुकसान करना है; असल में यह डरने का नहीं, बल्कि निवेश जारी रखकर भविष्य का मुनाफा पक्का करने का सबसे अच्छा मौका होता है।









