
बिहार सौर ऊर्जा के क्षेत्र में नए कीर्तिमान स्थापित कर रहा है। लखीसराय में भारत का सबसे बड़ा बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (BESS) बनाया जा रहा है, जो दिन में बनने वाली सौर ऊर्जा को स्टोर करेगा ताकि सूरज ढलने के बाद भी रात में निर्बाध बिजली मिलती रहे।
इसके साथ ही दानापुर डिवीजन की ट्रेनों में भी बड़ा बदलाव होने जा रहा है; अब ट्रेनों की छतों पर सोलर पैनल लगाए जाएंगे। इस सौर ऊर्जा का इस्तेमाल ट्रेन के पंखों, लाइटों और एयर कंडीशनिंग (AC) सिस्टम को चलाने के लिए किया जाएगा। इन कदमों से न केवल प्रदूषण कम होगा, बल्कि बिहार बिजली के मामले में आत्मनिर्भरता की ओर तेजी से बढ़ेगा।
पटना और दानापुर की ट्रेनों में अब ‘सोलर’ का सफर
पूर्व मध्य रेलवे का दानापुर मंडल एक शानदार मिसाल पेश करने जा रहा है। अब पटना जंक्शन और दानापुर से गुजरने वाली ट्रेनों की छतों पर सोलर पैनल लगाए जा रहे हैं। इस पहल का मुख्य उद्देश्य ‘ग्रीन एनर्जी’ को बढ़ावा देना है। इन पैनलों से पैदा होने वाली बिजली का उपयोग ट्रेन की लाइटों और पंखों के लिए किया जाएगा, जिससे न केवल बिजली की बचत होगी बल्कि ट्रेनों को चलाने में लगने वाले डीजल के खर्च में भी भारी कमी आएगी। दानापुर मंडल इस तकनीक का ट्रायल करने वाला इस जोन का पहला डिवीजन बन गया है। इसकी सफलता के बाद जल्द ही बिहार के अन्य रेल मंडलों में भी सोलर पैनल वाली ट्रेनें दौड़ती नजर आएंगी।
‘कैंपेन कोच’ की छतों पर लगेंगे फ्लेक्सिबल सोलर पैनल
दानापुर रेल मंडल ने ट्रेनों को सौर ऊर्जा से चलाने की शुरुआत अपने कैंपेन कोचों (मेंटेनेंस बोगियों) से करने का फैसला किया है। ये खास बोगियां होती हैं जिनका इस्तेमाल रेलवे ट्रैक की मरम्मत करने वाले रेल कर्मी करते हैं। इन बोगियों की छतों पर अत्याधुनिक फ्लेक्सिबल सोलर पैनल लगाए जाएंगे, जो मुड़ने में सक्षम होने के कारण छत की बनावट पर आसानी से फिट हो जाते हैं।
अनुमान है कि एक बोगी पर लगे इन पैनलों से प्रतिदिन औसतन 40 से 50 यूनिट बिजली पैदा होगी। इस बिजली का उपयोग बोगी के अंदरूनी उपकरणों को चलाने में होगा, जिससे बाहरी ऊर्जा स्रोतों पर निर्भरता कम होगी और रेलवे के मेंटेनेंस कार्यों में भी ‘ग्रीन एनर्जी’ का योगदान बढ़ेगा।
सोलर पैनल से चमचमाएंगे ट्रेन के कोच
ट्रेनों की छतों पर हल्के और फ्लेक्सिबल सोलर पैनल लगाना न केवल आसान है, बल्कि यह रेलवे के लिए बेहद फायदेमंद भी साबित होने वाला है। अनुमान है कि सौर ऊर्जा के इस्तेमाल से एक यात्री कोच हर साल करीब ₹1.5 लाख की बिजली बचाएगा। इस सिस्टम से ट्रेन के एसी (AC), पंखे, लाइटें और यहाँ तक कि मोबाइल चार्जिंग पॉइंट भी चलेंगे।
दानापुर रेल मंडल की योजना के अनुसार, कैंपेन कोच के बाद अब मेमू (MEMU) और इंटरसिटी एक्सप्रेस जैसी ट्रेनों में इसका ट्रायल होगा। एक बार सामान्य बोगियों में सफलता मिलने के बाद, इस तकनीक को पूरी तरह से वातानुकूलित (AC) कोचों में भी लागू किया जाएगा, जिससे सफर और भी सस्ता और पर्यावरण के अनुकूल हो जाएगा।
अब ट्रेनों में मिलेगी ज्यादा सीटें और शोर से मुक्ति
रेलवे में सोलर पैनलों का उपयोग सफर को पूरी तरह बदलने वाला है। वर्तमान में ट्रेनों में बिजली के लिए पावर कार (जनरेटर कोच) का इस्तेमाल होता है, जो भारी मात्रा में डीजल फूँकता है और बहुत शोर व धुआं पैदा करता है। सौर ऊर्जा आने से इस पावर कार की जरूरत खत्म हो जाएगी, जिससे न केवल प्रदूषण कम होगा बल्कि यात्रियों को शोर से भी राहत मिलेगी।
सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि पावर कार की जगह एक अतिरिक्त यात्री कोच (Extra Coach) लगाया जा सकेगा, जिससे ट्रेन की क्षमता बढ़ेगी और अधिक यात्रियों को कंफर्म टिकट मिल सकेगा। यह कदम रेलवे की कमाई और यात्रियों की सुविधा, दोनों के लिए ‘गेम चेंजर’ साबित होगा।
बिहार में बिजली महंगी होने का डर, लेकिन सौर ऊर्जा का ‘मेगा प्रोजेक्ट’ बनेगा ढाल
बिहार के उपभोक्ताओं के लिए एक मिली-जुली खबर है। बिजली कंपनियों ने 35 पैसे प्रति यूनिट की बढ़ोतरी का प्रस्ताव रखा है, जिसे मंजूरी मिलने पर 1 अप्रैल 2026 से बिजली महंगी हो सकती है। हालांकि, राहत की बात यह है कि बिहार में देश के सबसे बड़े सौर ऊर्जा और स्टोरेज प्रोजेक्ट पर काम तेजी से चल रहा है।
यह प्रोजेक्ट न केवल बड़े पैमाने पर बिजली पैदा करेगा, बल्कि उसे सुरक्षित (Store) भी रखेगा, जिससे भविष्य में बिजली की कमी और बढ़ती कीमतों पर लगाम लगेगी। यह मेगा प्रोजेक्ट बिहार के ऊर्जा क्षेत्र को पूरी तरह बदलकर राज्य को ‘ग्रीन एनर्जी’ का हब बनाने और पर्यावरण को सुरक्षित रखने में सबसे बड़ी भूमिका निभाएगा।
कजरा (लखीसराय) बनेगा देश का ‘पावर बैंक’
बिहार अब बिजली के मामले में आत्मनिर्भर होने के साथ-साथ देश का नेतृत्व करने के लिए तैयार है। लखीसराय जिले के कजरा में भारत का सबसे बड़ा बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (BESS) बनाया जा रहा है। यह एक विशाल ‘पावर बैंक’ की तरह काम करेगा, जो सौर ऊर्जा को भारी मात्रा में स्टोर करेगा।
इस महत्वाकांक्षी परियोजना से राज्य का बिजली ग्रिड अधिक स्थिर होगा और लोगों को बिना किसी रुकावट के वोल्टेज की समस्या के बिना बिजली मिलेगी। कजरा का यह प्रोजेक्ट न केवल बिहार में बिजली की सप्लाई को मजबूत करेगा, बल्कि देश भर में ग्रीन एनर्जी के सबसे सफल मॉडल के रूप में उभरेगा।
बिहार का अपना ‘जायंट पावर बैंक’, रात में भी नहीं कटेगी बिजली
बिहार का कजरा (लखीसराय) सोलर प्रोजेक्ट राज्य को ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में सबसे बड़ा कदम है। इस प्रोजेक्ट की खासियत इसका विशाल बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (BESS) है, जिसकी कुल क्षमता 495 मेगावाट ऑवर (MWh) होगी। यह भारत का अब तक का सबसे बड़ा बैटरी स्टोरेज सिस्टम बनने जा रहा है। इसके साथ ही 301 मेगावाट का सौर ऊर्जा प्लांट लगाया जा रहा है।
इस तकनीक का सबसे बड़ा फायदा यह है कि दिन में सूरज की रोशनी से बनने वाली अतिरिक्त बिजली को इन विशाल बैटरियों में स्टोर कर लिया जाएगा। जब रात में या पीक आवर्स के दौरान बिजली की मांग सबसे ज्यादा होगी, तब इसी स्टोर की गई ऊर्जा का इस्तेमाल होगा। इससे न केवल ग्रिड स्थिर रहेगा, बल्कि बिहार के गांवों और शहरों में बिजली की सप्लाई भी बिना किसी रुकावट के लगातार बनी रहेगी।
₹1810 करोड़ के निवेश से अब रात में भी रोशन होगा बिहार
बिहार के लखीसराय (कजरा) में चल रहे देश के सबसे बड़े सोलर प्रोजेक्ट ने अपनी पहली बड़ी कामयाबी हासिल कर ली है। ₹1810 करोड़ की लागत से इस प्रोजेक्ट का पहला चरण पूरा हो चुका है, जिसमें 185 मेगावाट का सोलर प्लांट और 254 MWh का बैटरी स्टोरेज सिस्टम शुरू हो गया है। इसे ग्रिड से जोड़ने के लिए 132 KV की नई लाइन और दमदार ट्रांसफार्मर भी तैयार हैं।
इस सिस्टम की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह ‘आड़े वक्त’ का साथी बनेगा; यानी दिन में स्टोर की गई बिजली का उपयोग रात में 4 से 5 घंटे तक किया जा सकेगा। वहीं, दूसरा चरण साल 2027 तक पूरा होने की उम्मीद है, जिसके बाद इसकी कुल क्षमता बढ़कर 301 मेगावाट सौर ऊर्जा और 495 MWh बैटरी स्टोरेज हो जाएगी। इससे बिहार में बिजली कटौती की समस्या लगभग खत्म हो जाएगी।
क्यों खास है बिहार का यह ‘स्मार्ट’ सोलर स्टोरेज सिस्टम?
बिहार सरकार का यह प्रोजेक्ट केवल बिजली पैदा करने के लिए नहीं, बल्कि भरोसेमंद और बिना रुकावट सप्लाई सुनिश्चित करने के लिए है। सामान्य सोलर प्लांट की सबसे बड़ी कमजोरी यह होती है कि वे केवल धूप रहने तक ही बिजली दे सकते हैं, लेकिन कजरा प्रोजेक्ट में लगा स्टोरेज सिस्टम इस समस्या को खत्म कर देगा। जब दिन में जरूरत से ज्यादा बिजली बनेगी, तो उसे स्टोर कर लिया जाएगा और शाम के समय—जब घरों और उद्योगों में बिजली की मांग सबसे ज्यादा होती है—तब इसका इस्तेमाल होगा। इससे ग्रिड पर लोड कम होगा और बार-बार होने वाली बिजली कटौती (Power Cut) से मुक्ति मिलेगी। साथ ही, कोयले और लकड़ी जैसे ईंधनों पर निर्भरता कम होने से बिहार पर्यावरण के अनुकूल आर्थिक विकास की नई ऊंचाइयां छुएगा।









