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8th Pay Commission News: केंद्रीय कर्मचारियों की चमकी किस्मत! मेडिकल अलाउंस सीधे 20,000 रुपये करने का प्रस्ताव, देखें डिटेल।

8वें वेतन आयोग पर कर्मचारी संगठनों ने फिक्स्ड मेडिकल अलाउंस को 1,000 से सीधे 20,000 रुपये मासिक करने की बड़ी मांग रखी है, खासकर नॉन‑CGHS इलाकों में रहने वाले कर्मचारियों और पेंशनर्स के लिए। यह प्रस्ताव बढ़ती मेडिकल महंगाई और इलाज के खर्च को देखते हुए तैयार किए जा रहे संयुक्त मांग‑पत्र का सबसे अहम हिस्सा है, जिस पर अब आयोग और सरकार की प्रतिक्रिया का इंतजार है।

By Pinki Negi

8th Pay Commission News: केंद्रीय कर्मचारियों की चमकी किस्मत! मेडिकल अलाउंस सीधे 20,000 रुपये करने का प्रस्ताव, देखें डिटेल।

8वें वेतन आयोग को लेकर कर्मचारियों और पेंशनर्स की उम्मीदें अब ठोस माँगों के रूप में सामने आ रही हैं, जिनमें सबसे बड़ी चर्चा फिक्स्ड मेडिकल अलाउंस को 1,000 रुपये से बढ़ाकर 20,000 रुपये प्रति माह करने के प्रस्ताव को लेकर है। हालांकि यह डिमांड अभी विचाराधीन है और इस पर सरकार की अंतिम मुहर लगनी बाकी है, लेकिन यूनियनों की आक्रामक तैयारी ने बहस को तेज कर दिया है।

8वें वेतन आयोग की पृष्ठभूमि

केंद्र सरकार 8वें वेतन आयोग के जरिए करीब 50 लाख केंद्रीय कर्मचारियों और लगभग 69 लाख पेंशनर्स की सैलरी, पेंशन और भत्तों की समीक्षा कर रही है। आयोग को अपनी रिपोर्ट सौंपने के लिए लगभग 18 महीने का समय दिया गया है, लेकिन सिफारिशें कब से लागू होंगी, इस पर सरकार ने अभी कोई स्पष्ट टाइमलाइन घोषित नहीं की है। फिलहाल आयोग ने अपना दफ्तर शुरू कर काम की रफ्तार तेज की है और कर्मचारी संगठन चरणबद्ध तरीके से अपने मांग-पत्र (चार्टर ऑफ डिमांड्स) सौंप रहे हैं।

1,000 से 20,000 रुपये MA की बड़ी डिमांड

इस बार की चर्चाओं के केंद्र में फिक्स्ड मेडिकल अलाउंस (FMA) है, जो उन कर्मचारियों और पेंशनर्स को दिया जाता है जो सेंट्रल गवर्नमेंट हेल्थ स्कीम (CGHS) के दायरे से बाहर वाले क्षेत्रों में रहते हैं। वर्तमान में यह भत्ता सिर्फ 1,000 रुपये प्रति माह है, जिसे यूनियनें अत्यंत कम और मौजूदा मेडिकल महंगाई के हिसाब से ‘नाकाफी’ बता रही हैं। संयुक्त प्रस्ताव में इसे सीधे 20 गुना बढ़ाकर 20,000 रुपये प्रति माह करने की मांग रखी गई है, ताकि निजी डॉक्टर, दवाइयां, पैथोलॉजी जांच और छोटे-मोटे ऑपरेशन जैसे खर्चों की वास्तविक भरपाई हो सके।

कर्मचारी संगठनों का तर्क है कि ग्रामीण इलाकों और दूरदराज के क्षेत्रों में, जहां सरकारी अस्पतालों की सुविधाएं सीमित हैं और CGHS का नेटवर्क मौजूद नहीं है, पेंशनर्स को इलाज के लिए प्राइवेट सेक्टर पर निर्भर रहना पड़ता है। ऐसे में 1,000 रुपये का FMA सिर्फ प्रतीकात्मक मदद बनकर रह गया है, जबकि जरा सी बीमारी में ही महीना भर की दवाइयों का खर्च कई हजार रुपये तक पहुंच जाता है।

यूनियनों की दलीलें और चार्टर ऑफ डिमांड्स

कर्मचारी प्रतिनिधियों ने बैठकों में साफ कहा है कि अगर सरकार बुजुर्ग पेंशनर्स और छोटे कस्बों में कार्यरत कर्मचारियों को वास्तविक राहत देना चाहती है, तो मेडिकल अलाउंस में बड़ी बढ़ोतरी के बिना यह संभव नहीं है। उनका कहना है कि हेल्थ इंफ्लेशन लगातार सामान्य महंगाई से ऊपर चल रहा है, ऐसी स्थिति में या तो CGHS नेटवर्क का बड़े पैमाने पर विस्तार हो या FMA को जमीनी हकीकत के हिसाब से पुनर्निर्धारित किया जाए।

इसी संदर्भ में 8वें वेतन आयोग के लिए तैयार किए जा रहे संयुक्त मांग-पत्र में FMA बढ़ाने का प्रस्ताव केंद्रीय बिंदुओं में शामिल किया गया है। यूनियनें इसे ‘सिर्फ भत्ता नहीं, हेल्थ सिक्योरिटी का न्यूनतम гарант’ बताकर पेश कर रही हैं, ताकि इसे सामान्य अलाउंस की तरह नजरअंदाज न किया जा सके।

सिर्फ मेडिकल नहीं, ये बड़ी माँगें भी मेन फोकस

मेडिकल अलाउंस के साथ‑साथ कई अन्य अहम आर्थिक मुद्दे भी 8वें वेतन आयोग के सामने रखे गए हैं।
इनमें प्रमुख हैं:

  • फिटमेंट फैक्टर को 3.25 तक करने की मांग, ताकि बेसिक पे में एकमुश्त अच्छी बढ़ोतरी सुनिश्चित हो सके।
  • वार्षिक वेतन वृद्धि (इंक्रीमेंट) को मौजूदा 3% से बढ़ाकर 5-7% के दायरे में लाने का प्रस्ताव, जिसे यूनियनें लंबे समय से ‘बहुत कम’ मानती रही हैं।
  • रिटायरमेंट बेनेफिट्स में सुधार, जैसे ग्रेच्युटी की सीमा पर पुनर्विचार, लीव एनकैशमेंट लिमिट में संशोधन और पेंशन फार्मूले को अधिक उदार बनाना।
  • अवकाश और यात्रा भत्तों के नियमों को वर्तमान जीवन-शैली और फैमिली स्ट्रक्चर के अनुरूप अपडेट करने की मांग।

कर्मचारियों और पेंशनर्स की उम्मीदें

अनुमान है कि 8वें वेतन आयोग की सिफारिशें लागू होने पर लगभग 1 करोड़ के आसपास केंद्रीय कर्मचारी और पेंशनर्स प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित होंगे। कर्मचारियों को उम्मीद है कि इस बार आयोग सिर्फ बेसिक वेतन और ग्रेड पे पर नहीं, बल्कि हेल्थ सिक्योरिटी, पोस्ट‑रिटायरमेंट लाइफ और भत्तों की वास्तविक उपयोगिता पर भी फोकस करेगा।

हालांकि फिलहाल सभी प्रस्ताव विचाराधीन हैं और मेडिकल अलाउंस को 20,000 रुपये करने के सुझाव पर सरकार ने कोई आधिकारिक निर्णय घोषित नहीं किया है। लेकिन जैसे‑जैसे आयोग अपना डेटा और फीडबैक जुटा रहा है, वैसे‑वैसे कर्मचारियों की नजरें उसकी अंतरिम और अंतिम सिफारिशों पर टिकती जा रही हैं। अंतिम फैसला यही तय करेगा कि 20,000 रुपये मासिक FMA जैसी मांगें जमीन पर उतरती हैं या फिर एक और वेतन आयोग चर्चाओं के साथ खत्म हो जाता है।

Author
Pinki Negi
GyanOK में पिंकी नेगी बतौर न्यूज एडिटर कार्यरत हैं। पत्रकारिता में उन्हें 7 वर्षों से भी ज़्यादा का अनुभव है। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत साल 2018 में NVSHQ से की थी, जहाँ उन्होंने शुरुआत में एजुकेशन डेस्क संभाला। इस दौरान पत्रकारिता के क्षेत्र में नए-नए अनुभव लेने के बाद अमर उजाला में अपनी सेवाएं दी। बाद में, वे नेशनल ब्यूरो से जुड़ गईं और संसद से लेकर राजनीति और डिफेंस जैसे कई महत्वपूर्ण विषयों पर रिपोर्टिंग की। पिंकी नेगी ने साल 2024 में GyanOK जॉइन किया और तब से GyanOK टीम का हिस्सा हैं।

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