
बंगाल की खाड़ी और हिंद महासागर के संगम पर बसा ये छोटा-सा बंदरगाह शहर कभी रौनकमय था, लेकिन 1964 के भयानक चक्रवात ने इसे एक ही रात में भूतिया खंडहर में तब्दील कर दिया। 800 से ज्यादा जानें गईं, पूरा शहर समुद्र में समा गया, और आज सिर्फ टूटे-फूटे अवशेष सन्नाटे की गवाही देते हैं। साफ मौसम में यहां से श्रीलंका का किनारा तक नजर आता है, जो इस जगह को और रहस्यमय बनाता है।
1964 चक्रवात का कहर
22 नवंबर 1964 को आए इस तूफान ने प्रकृति का कहर दिखाया। हवाओं की रफ्तार 270 किमी/घंटा तक पहुंच गई, 20 फीट ऊंची लहरें उठीं, और पंबन ब्रिज भी बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया। शहर का संपर्क पूरी तरह कट गया, हजारों लोग फंस गए।
शहर के खंडहरों की गवाही
पहले धनुषकोड़ी एक जीवंत बंदरगाह था, जहां व्यापार फलता-फूलता था। पुराना रेलवे स्टेशन, चर्च, स्कूल और घर आज खंडहर बन चुके हैं, जो उस भयावह रात की याद दिलाते हैं। पर्यटक इन्हें देखने आते हैं, लेकिन विकास की कमी से जगह वीरान ही लगती है।
रामसेतु से जुड़ी पौराणिक कथा
धनुषकोड़ी की एक और पौराणिक खासियत रामसेतु (एडम्स ब्रिज) से जुड़ाव है। मान्यता है कि भगवान राम ने यहीं से लंका तक पुल बनवाया था। पास का रामेश्वरम मंदिर पर्यटकों का केंद्र है, जहां हस्तशिल्प, रेशमी साड़ियां और स्थानीय व्यंजन मिलते हैं।
एकांतमय रास्ता और भूतिया अनुभव
लेकिन धनुषकोड़ी का 18 किमी लंबा रास्ता एकांतमय है- दोनों तरफ समुद्र, रेत के टीले और सन्नाटा। शाम ढलते ही पर्यटकों को लौटना पड़ता है, क्योंकि रात में रुकना प्रतिबंधित है। कई सैलानी यहां अजीब शांति, भारीपन या अधूरी आत्माओं की मौजूदगी महसूस करते हैं। स्थानीय किंवदंतियां बताती हैं कि चक्रवात रात में भटकने वाली रूहें आज भी कहानियां सुना जाती हैं।
वैश्विक तुलना और पर्यटन संभावनाएं
दुनिया में ऐसे और उदाहरण हैं, जैसे ग्रीस का पावेलोपेट्री- समुद्र तल पर 5000 साल पुराना डूबा शहर, जो भूकंप से एक रात में भूतिया हो गया। लेकिन धनुषकोड़ी भारतीय संदर्भ में अनोखा है। सरकारी प्रयासों से अब जीप सफारी और गाइडेड टूर शुरू हो रहे हैं, फिर भी ये घोस्ट टाउन पर्यटकों को लुभाता है। अगर आप साहसिक ट्रिप प्लान कर रहे हैं, तो रामेश्वरम से दिन में जाएं- लेकिन उस रात की भयावहता की कल्पना आपको रुला देगी।









