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Property Rule 2026: पूरी संपत्ति पर नहीं चलेगी आपकी मनमानी! जानें वसीयत का ‘1/3 नियम’, वरना कोर्ट में रद्द हो जाएगा आपका दावा

क्या आप जानते हैं कि अपनी ही संपत्ति की पूरी वसीयत करना आपको कानूनी मुसीबत में डाल सकता है? मुस्लिम कानून का 'एक-तिहाई नियम' वारिसों के हक की रक्षा करता है। जानें छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का वह ऐतिहासिक फैसला, जिसने वसीयत के खेल को पूरी तरह पलट दिया। अपनी मेहनत की कमाई को विवादों से बचाने के लिए यह नियम जानना आपके लिए बेहद ज़रूरी है।

By Pinki Negi

Property Rule 2026: पूरी संपत्ति पर नहीं चलेगी आपकी मनमानी! जानें वसीयत का '1/3 नियम', वरना कोर्ट में रद्द हो जाएगा आपका दावा।
Property Rule 2026

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि कोई भी मुस्लिम व्यक्ति अपनी कुल संपत्ति के एक-तिहाई (1/3) हिस्से से ज़्यादा की वसीयत किसी और के नाम नहीं कर सकता। अगर वह इससे ज़्यादा हिस्सा किसी को देना चाहता है, तो इसके लिए बाकी कानूनी वारिसों की सहमति होना ज़रूरी है। कोर्ट ने यह फैसला एक विधवा महिला को न्याय देते हुए सुनाया, जिसे पहले उसके पति की संपत्ति में हिस्सा देने से मना कर दिया गया था।

पति की संपत्ति के लिए विधवा का लंबी कानूनी संघर्ष

यह मामला कोरबा जिले का है, जहाँ 64 वर्षीय जैबुन निशा ने साल 2004 में अपने पति अब्दुल सत्तार लोधिया की मृत्यु के बाद उनकी संपत्ति पर अपने अधिकार के लिए कानूनी लड़ाई शुरू की। विवाद तब शुरू हुआ जब उनके भतीजे मोहम्मद सिकंदर ने खुद को ‘पालक बेटा’ बताते हुए एक वसीयत पेश की, जिसमें पूरी जायदाद उसके नाम लिखी थी। जैबुन निशा ने इस वसीयत को फर्जी करार दिया, लेकिन निचली अदालतों से उन्हें राहत नहीं मिली। हार न मानते हुए उन्होंने हाईकोर्ट में अपील की, जहाँ कोर्ट ने उनके पक्ष में फैसला सुनाया और स्पष्ट किया कि बिना वारिसों की सहमति के एक-तिहाई से अधिक संपत्ति की वसीयत नहीं की जा सकती।

हाईकोर्ट ने सुधारी निचली अदालत की गलती

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के जस्टिस बिभू दत्ता गुरु की बेंच ने निचली अदालतों के पुराने फैसलों को रद्द करते हुए विधवा महिला के पक्ष में फैसला सुनाया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि निचली अदालतों ने मुस्लिम कानून को समझने और महिला के अधिकारों की रक्षा करने में चूक की थी। मुस्लिम कानून की धारा 117 और 118 का हवाला देते हुए जस्टिस ने कहा कि कोई भी व्यक्ति अपनी मर्जी से पूरी संपत्ति की वसीयत नहीं कर सकता; इसकी अधिकतम सीमा एक-तिहाई (1/3) ही है। यदि कोई व्यक्ति इससे ज्यादा संपत्ति किसी को देना चाहता है, तो संपत्ति के अन्य कानूनी वारिसों की लिखित या स्पष्ट सहमति होना अनिवार्य है।

साबित करने की जिम्मेदारी और सहमति पर कोर्ट की अहम टिप्पणी

जस्टिस गुरु ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि निचली अदालतों ने सबूत पेश करने की जिम्मेदारी गलत व्यक्ति पर डाल दी थी। कोर्ट के अनुसार, यह विधवा (जैबुन निशा) का काम नहीं था कि वह वसीयत को गलत साबित करे, बल्कि यह भतीजे सिकंदर की जिम्मेदारी थी कि वह ठोस सबूत पेश करे कि जैबुन निशा ने अपनी मर्जी और पूरी समझ के साथ वसीयत के लिए सहमति दी थी।

कोर्ट ने यह भी साफ किया कि किसी व्यक्ति की खामोशी या कानूनी कार्रवाई में देरी को उसकी ‘सहमति’ नहीं माना जा सकता। चूँकि इस मामले में कोई भी गवाह सहमति की बात साबित नहीं कर पाया, इसलिए कोर्ट ने विधवा के हक को बहाल किया।

वसीयत की सीमा और उत्तराधिकारियों के अधिकारों की रक्षा

हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में यह कड़ा रुख अपनाया कि यदि भतीजे द्वारा पेश की गई वसीयत असली भी मान ली जाती, तब भी वह कानूनन संपत्ति के एक-तिहाई (1/3) हिस्से से अधिक का हकदार नहीं हो सकता था। कोर्ट ने निचली अदालतों के फैसलों को रद्द करते हुए जोर दिया कि मुस्लिम कानून का सबसे बुनियादी सिद्धांत ही यह है कि अन्य कानूनी वारिसों के हितों की रक्षा की जाए। जस्टिस गुरु ने स्पष्ट किया कि ‘एक-तिहाई’ की कानूनी सीमा से ऊपर की गई कोई भी वसीयत तब तक प्रभावी या लागू नहीं मानी जा सकती, जब तक कि संपत्ति के बाकी असली वारिस इसके लिए अपनी स्पष्ट मंजूरी न दे दें।

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Pinki Negi
GyanOK में पिंकी नेगी बतौर न्यूज एडिटर कार्यरत हैं। पत्रकारिता में उन्हें 7 वर्षों से भी ज़्यादा का अनुभव है। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत साल 2018 में NVSHQ से की थी, जहाँ उन्होंने शुरुआत में एजुकेशन डेस्क संभाला। इस दौरान पत्रकारिता के क्षेत्र में नए-नए अनुभव लेने के बाद अमर उजाला में अपनी सेवाएं दी। बाद में, वे नेशनल ब्यूरो से जुड़ गईं और संसद से लेकर राजनीति और डिफेंस जैसे कई महत्वपूर्ण विषयों पर रिपोर्टिंग की। पिंकी नेगी ने साल 2024 में GyanOK जॉइन किया और तब से GyanOK टीम का हिस्सा हैं।

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