
सेना और बड़े सरकारी पदों से रिटायर हुए वरिष्ठ अधिकारियों के लिए रिटायरमेंट के बाद किताब या संस्मरण प्रकाशित करने पर 20 साल का सख्त ‘कूलिंग-ऑफ पीरियड’ लगाने की सरकारी तैयारी ने राजनीतिक और कानूनी हलकों में हंगामा मचा दिया है। हिन्दुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, सूत्रों ने बताया कि केंद्रीय कैबिनेट की हालिया बैठक में कई मंत्रियों ने इसकी वकालत की, हालांकि यह आधिकारिक एजेंडे का हिस्सा नहीं था। जल्द ही औपचारिक आदेश जारी हो सकता है, जो पूर्व सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की अप्रकाशित आत्मकथा ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ विवाद से उपजा है।
प्रस्ताव का बैकग्राउंड
यह प्रस्ताव राष्ट्रीय गोपनीयता और सुरक्षा के नाम पर आया है। सरकार का तर्क है कि रिटायरमेंट के तुरंत बाद संवेदनशील जानकारियां सार्वजनिक होना राष्ट्रीय हितों के खिलाफ है। विशेषज्ञों का कहना है कि वर्तमान में आधिकारिक गोपनीयता कानून (OSA) के तहत गोपनीय जानकारी उजागर करना अपराध है, लेकिन रिटायर्ड अधिकारियों के लिए कोई एकसमान नियम नहीं। 2025 में DoPT ने साहित्यिक कार्यों के लिए पूर्व अनुमति जरूरी न बताते हुए सरकारी आलोचना पर रोक लगाई थी, मगर अब 20 साल का पीरियड सैन्य और IAS/IPS जैसे पदों पर फोकस कर रहा है।
नरवणे किताब विवाद
विवाद की जड़ है जनरल नरवणे की किताब, जिसमें 2020 के पूर्वी लद्दाख भारत-चीन टकराव की घटनाओं का जिक्र है। 2 फरवरी को लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने इसका हवाला दिया, जिस पर सरकार ने आपत्ति जताई कि किताब अप्रकाशित है। राहुल ने कॉपी लेकर सदन पहुंच विवाद बढ़ाया, और जल्द ही PDF सोशल मीडिया पर वायरल हो गई।
प्रकाशक और पुलिस की कार्रवाई
प्रकाशक पेंगुइन रैंडम हाउस ने बयान जारी कर इसे कॉपीराइट उल्लंघन बताया और कानूनी कार्रवाई की चेतावनी दी। दिल्ली पुलिस ने FIR दर्ज कर जांच शुरू की, पेंगुइन से सवाल पूछे। नरवणे ने खुद कहा कि किताब न छपी, न बिकी। दिलचस्प है कि जनवरी 2024 में रिलीज प्लान थी, दिसंबर 2023 में PTI ने अंश छापे, और नरवणे ने प्री-ऑर्डर लिंक शेयर किया था। रक्षा मंत्रालय ने पिछले साल से मंजूरी नहीं दी, पेंशन नियमों का हवाला देकर।
कैबिनेट की अनौपचारिक चर्चा
शुक्रवार की कैबिनेट बैठक में 27 सूत्री एजेंडे के अलावा मंत्रियों ने कूलिंग पीरियड पर जोर दिया। सूत्र बताते हैं, प्रभावशाली पदों (सेना प्रमुख, कैबिनेट सचिव) पर रहने वालों को 20 साल इंतजार करना पड़ेगा। यह 2021 के उस असफल प्रस्ताव से अलग है, जब मोदी सरकार पर रिटायर्ड नौकरशाहों को रोकने के आरोप लगे थे। अब फोकस गोपनीयता पर है, न कि सामान्य लेखन पर।
प्रभाव और आलोचना के बादल
यदि लागू हुआ, तो पूर्व अफसर अपनी कहानी दशकों बाद ही सुना सकेंगे। लेखक संगठन और RTI कार्यकर्ता इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला बता रहे। पूर्व जजों ने कहा, अदालतें चुनौती देंगी। सेना के लिए पहले से सेंसरशिप है, लेकिन 20 साल का पीरियड कठोर लगता। विपक्ष इसे नरवणे विवाद से जोड़कर सरकार को घेर रहा।









