
दुनिया भर में करोड़ों लोग टाइप-2 डायबिटीज की चपेट में हैं, जिन्हें जीवन भर इंसुलिन इंजेक्शन और दवाओं पर निर्भर रहना पड़ता है। यह बीमारी पैंक्रियास की इंसुलिन बनाने वाली कोशिकाओं को निष्क्रिय कर देती है, जिससे ब्लड शुगर कंट्रोल से बाहर हो जाता है। लेकिन चीन के वैज्ञानिकों ने एक ऐसी उम्मीद जगाई है, जो डायबिटीज के इलाज को हमेशा के लिए बदल सकती है। फरवरी 2026 में शंघाई के शांगजेंग अस्पताल और पेकिंग यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने दावा किया कि स्टेम सेल थेरेपी से 59 वर्षीय टाइप-2 मरीज को पूरी तरह ठीक कर दिया गया। यह दुनिया का पहला ऐसा केस है, जहां मरीज को अब दवाओं या इंसुलिन की जरूरत नहीं।
क्या है यह स्टेम सेल थेरेपी?
स्टेम सेल थेरेपी को ‘जादुई इलाज’ कहा जा रहा है, क्योंकि यह मरीज के ही शरीर की स्टेम कोशिकाओं से लैब में नई पैंक्रियाटिक आइलेट कोशिकाएं तैयार करती है। ये कोशिकाएं इंसुलिन उत्पादन के लिए जिम्मेदार होती हैं। शोधकर्ताओं ने मरीज की कोशिकाओं को प्रोग्राम करके हेल्दी आइलेट सेल्स बनाईं, जिन्हें पेट के आसपास ट्रांसप्लांट किया गया।
ट्रांसप्लांट के बाद ये कोशिकाएं ब्लड सप्लाई से जुड़कर जरूरत के हिसाब से इंसुलिन रिलीज करने लगीं। एक साल बाद मरीज का ब्लड शुगर सामान्य है और HbA1c लेवल भी नियंत्रित। इससे पहले यह तकनीक टाइप-1 डायबिटीज में सफल रही, लेकिन टाइप-2 के लिए यह मील का पत्थर है।
कैसे काम करती है यह तकनीक?
प्रक्रिया सरल लेकिन जटिल है। सबसे पहले मरीज से स्किन या ब्लड कोशिकाएं ली जाती हैं, जिन्हें iPSCs (इंड्यूस्ड प्लुरिपोटेंट स्टेम सेल्स) में बदला जाता है। लैब में ये स्टेम सेल्स को पैंक्रियाटिक बीटा सेल्स में परिवर्तित की जाती हैं। फिर इन्हें मरीज के पेट में इंजेक्ट किया जाता है, जहां ये वास्कुलराइज होकर काम शुरू कर देती हैं।
चीन के इस ट्रायल में मरीज को केवल एक सेशन में थेरेपी दी गई, जिसके बाद इंसुलिन बंद हो गया। विशेषज्ञों का कहना है कि यह ‘रिजनरेटिव मेडिसिन’ का उदाहरण है, जो क्षतिग्रस्त अंगों को खुद ठीक करने की क्षमता देता है। हालांकि, पुराने ट्रायल्स जैसे कानपुर के हैलट अस्पताल (2022) में ब्लड शुगर तो कंट्रोल हुआ, लेकिन पूर्ण इलाज नहीं।
सभी मरीजों पर कारगर?
दिल्ली के जीटीबी हॉस्पिटल के मेडिसिन विभागाध्यक्ष डॉ. अजीत कुमार कहते हैं, “यह थेरेपी हर मरीज पर एक जैसी काम नहीं करेगी। इम्यून रिजेक्शन की समस्या बनी रहेगी, क्योंकि शरीर नई कोशिकाओं को विदेशी समझ सकता है।” टाइप-2 में इंसुलिन रेसिस्टेंस भी फैक्टर है, जो स्टेम सेल्स को प्रभावित कर सकता है। चीन का केस सिंगल पेशेंट स्टडी है; बड़े क्लिनिकल ट्रायल्स (फेज-2/3) की कमी है। अमेरिकी FDA और ICMR जैसी संस्थाएं चेतावनी देती हैं कि लंबे समय के साइड इफेक्ट्स, जैसे ट्यूमर का खतरा, अभी अज्ञात हैं। भारत में CDSCO की सख्त मंजूरी के बावजूद अवैध क्लिनिक्स से सावधान रहें।
भारत के लिए क्या मतलब?
भारत में 10 करोड़ से ज्यादा डायबिटीज मरीज हैं। अगर यह थेरेपी सफल हुई, तो लाखों का जीवन बदलेगा। लेकिन फिलहाल यह शुरुआती स्टेज में है। विशेषज्ञ सलाह देते हैं: डाइट, व्यायाम और दवाओं पर फोकस करें। स्टेम सेल रिसर्च में भारत पीछे नहीं; AIIMS और PGIMER जैसे संस्थान ट्रायल्स चला रहे हैं। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि 5-10 साल में यह व्यावसायिक हो सकती है। तब तक जागरूकता जरूरी—डायबिटीज कंट्रोल ही असली इलाज है।









